[लोक में लगी है आग-
जरा की आग और मर जाने की आग, उसे दान देकर बुझाए।]
एक समय भगवान श्रावस्ती में अनाथपिण्डिक के जेतवन आराम में विहार करते थे।
तब, कोई देवता रात बीतने पर अपनी चमक से सारे जेतवन को प्रकाशित करते हुये जहां भगवान थे वहां आया और भगवान का अभिवादन कर एक और खड़ा हो गया। एक ओर खड़ा वह देवता को भगवान ने यह कहा-
"घर में आग लग जाने पर,
जो अपने संपत्ति बाहर निकाल लेता है, वह उसकी भलाई के लिए होता है;नहीं तो वह वहीं जलकर राख हो जाता है।
उसी प्रकार, इस सारे लोक में आग लग गई है, जरा की आग, और मर जाने की आग। दान देकर बाहर निकाल लो, दान दिया गया अच्छी तरह रक्षित रहता है। दान देने से सुख की प्राप्ति होती है, नहीं देने से उसे ऐसा ही होता है। चोर चुरा लेते हैं, या राजा हर लेते हैं, या आग लग जाती है, या नष्ट हो जाता है और आखिर में तो सब ही छूट जाता है, यह शरीर भी, और साथ साथ सारी सम्पत्ति,
इसे जान, बूझ कर पण्डित पुरुष, भोग भी करते हैं और दान भी देते हैं। अपने सामर्थ्य के अनुकूल देकर और भोग कर, निन्दा रहित हो सुख पाता है।"
भिक्खु और भिक्खुणी धम्म का दान देते है। उपासक व उपासिकायें विहार का दान देते है,भोजन का दान देते है, अर्थ का भी दान देते है। इससे संसार में धम्म बढता है। धम्म बढने से संसार में सुख,शान्ति और सलामती मिलती है, लोग निर्भय रहते है।
जो लोग श्रद्धा से दान देते है वे संसार में सुख पाते है।
दान देने से जरा और मरण से मुक्ति मिलती है।
नमो बुद्धाय🙏🏻🙏🏻🙏🏻
Ref:आदित्त सुत्त(संयुतनिकाय)
10.08.2023


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