एक समय आयुष्मान महाकात्यायन अवन्ती जनपद के पर्वत-स्थित कुल-घर (नगर) में विहार कर रहे थे। तब कुल-घर में रहने वाली काळी उपासिका जहां आयुष्मान महाकात्यायन थे, वहां गई। पास जाकर आयुष्मान महाकात्यायन की अभिवादन कर एक ओर बैठ गई।
एक ओर बैठी, कुलघर की काळी उपासिका ने आयुष्मान महाकात्यायन को यह कहा-
" भन्ते! कुमारि-प्रश्नों में भगवान के द्वारा यह कहा गया है -
"अत्थस्स पत्तिं हदयस्स सन्तिं,
जेत्वान सेनं पियसातरूपं ।
एकोहं झायं सुखमनुबोधिं,
तस्मा जनेन न करोमि सखिं,
सखी न सम्पज्जति केनचि मे'ति ।"
- प्रिय-आस्वाद रूपी सेना को जीतकर, परमार्थ तथा हृदय की शान्ति को प्राप्त, मैं सुख-स्वरूप बोधि का अनुभव करता हुआ अकेला ही ध्यान करता हूं,
इसलिए मैं लोगों की संगति नहीं करता हूं, मेरी किसी से भी दोस्ती नहीं है।
“ भन्ते! कृपा कर बताएं कि भगवान द्वारा संक्षेप में दिए गए इस बुद्ध वचन का विस्तृत अर्थ क्या है?"
“ बहन! किन्हीं-किन्हीं श्रमण-ब्राह्मणों ने पृथ्वी-कसिण ध्यान को ही परम अर्थ मानकर उसे प्राप्त किया है।
बहन ! भगवान ने जहां तक पृथ्वी-कसिण की सीमा है, वहां तक उसे जान लिया। उसे जानकर भगवान ने उसके आस्वाद को जाना, उसके दुष्परिणाम को जाना, उस बंधन से मुक्त होने को जाना तथा मार्गामार्ग ज्ञान-दर्शन को जाना।
यह जो (परम) अर्थ की प्राप्ति तथा हृदय की शान्ति कहा गया है; यह उसके आस्वाद के जानने, उसके दुष्परिणाम के जानने, उस बंधन से मुक्त होने को जानने तथा मार्गामार्ग ज्ञान-दर्शन को जानने के ही कारण कहा गया है।
बहन ! किन्हीं-किन्हीं श्रमण-ब्राह्मणों ने आप (=जल) कसिण ध्यान को ही परम अर्थ मानकर उसे प्राप्त किया है।
बहन !
भगवान ने जहां तक आप (=जल)-कसिण की सीमा है, वहां तक उसे जान लिया। उसे जानकर भगवान ने उसके आस्वाद को जाना, उसके दुष्परिणाम को जाना, उस बंधन से मुक्त होने को जाना तथा मार्गामार्ग ज्ञान-दर्शन को जाना।
यह जो (परम) अर्थ की प्राप्ति तथा हृदय की शान्ति कहा गया है; यह उसके आस्वाद के जानने, उसके दुष्परिणाम के जानने, उस बंधन से मुक्त होने को जानने तथा मार्गामार्ग ज्ञान-दर्शन को जानने के ही कारण कहा गया है।
बहन ! किन्हीं-किन्हीं श्रमण-ब्राह्मणों ने तेज (=अग्नि) कसिण ध्यान को ही परम अर्थ मानकर उसे प्राप्त किया है।
बहन !
भगवान ने जहां तक तेज (=अग्नि)-कसिण की सीमा है, वहां तक उसे जान लिया। उसे जानकर भगवान ने उसके आस्वाद को जाना, उसके दुष्परिणाम को जाना, उस बंधन से मुक्त होने को जाना तथा मार्गामार्ग ज्ञान-दर्शन को जाना।
यह जो (परम) अर्थ की प्राप्ति तथा हृदय की शान्ति कहा गया है; यह उसके आस्वाद के जानने, उसके दुष्परिणाम के जानने, उस बंधन से मुक्त होने को जानने तथा मार्गामार्ग ज्ञान-दर्शन को जानने के ही कारण कहा गया है।
बहन ! किन्हीं-किन्हीं श्रमण-ब्राह्मणों ने वायु (=हवा) कसिण ध्यान को ही परम अर्थ मानकर उसे प्राप्त किया है।
बहन !
भगवान ने जहां तक वायु (=हवा)-कसिण की सीमा है, वहां तक उसे जान लिया। उसे जानकर भगवान ने उसके आस्वाद को जाना, उसके दुष्परिणाम को जाना, उस बंधन से मुक्त होने को जाना तथा मार्गामार्ग ज्ञान-दर्शन को जाना।
यह जो (परम) अर्थ की प्राप्ति तथा हृदय की शान्ति कहा गया है; यह उसके आस्वाद के जानने, उसके दुष्परिणाम के जानने, उस बंधन से मुक्त होने को जानने तथा मार्गामार्ग ज्ञान-दर्शन को जानने के ही कारण कहा गया है।
बहन ! किन्हीं-किन्हीं श्रमण-ब्राह्मणों ने नील-कसिण ध्यान को ही परम अर्थ मानकर उसे प्राप्त किया है।
बहन ! भगवान ने जहां तक नील-कसिण की सीमा है, वहां तक उसे जान लिया। उसे जानकर भगवान ने उसके आस्वाद को जाना, उसके दुष्परिणाम को जाना, उस बंधन से मुक्त होने को जाना तथा मार्गामार्ग ज्ञान-दर्शन को जाना।
यह जो (परम) अर्थ की प्राप्ति तथा हृदय की शान्ति कहा गया है; यह उसके आस्वाद के जानने, उसके दुष्परिणाम के जानने, उस बंधन से मुक्त होने को जानने तथा मार्गामार्ग ज्ञान-दर्शन को जानने के ही कारण कहा गया है।
बहन ! किन्हीं-किन्हीं श्रमण-ब्राह्मणों ने पीत-कसिण ध्यान को ही परम अर्थ मानकर उसे प्राप्त किया है।
बहन ! भगवान ने जहां तक पीत-कसिण की सीमा है, वहां तक उसे जान लिया। उसे जानकर भगवान ने उसके आस्वाद को जाना, उसके दुष्परिणाम को जाना, उस बंधन से मुक्त होने को जाना तथा मार्गामार्ग ज्ञान-दर्शन को जाना।
यह जो (परम) अर्थ की प्राप्ति तथा हृदय की शान्ति कहा गया है; यह उसके आस्वाद के जानने, उसके दुष्परिणाम के जानने, उस बंधन से मुक्त होने को जानने तथा मार्गामार्ग ज्ञान-दर्शन को जानने के ही कारण कहा गया है।
बहन ! किन्हीं-किन्हीं श्रमण-ब्राह्मणों ने लोहित-कसिण ध्यान को ही परम अर्थ मानकर उसे प्राप्त किया है।
बहन ! भगवान ने जहां तक लोहित-कसिण की सीमा है, वहां तक उसे जान लिया। उसे जानकर भगवान ने उसके आस्वाद को जाना, उसके दुष्परिणाम को जाना, उस बंधन से मुक्त होने को जाना तथा मार्गामार्ग ज्ञान-दर्शन को जाना।
यह जो (परम) अर्थ की प्राप्ति तथा हृदय की शान्ति कहा गया है; यह उसके आस्वाद के जानने, उसके दुष्परिणाम के जानने, उस बंधन से मुक्त होने को जानने तथा मार्गामार्ग ज्ञान-दर्शन को जानने के ही कारण कहा गया है।
बहन ! किन्हीं-किन्हीं श्रमण-ब्राह्मणों ने श्वेत-कसिण ध्यान को ही परम अर्थ मानकर उसे प्राप्त किया है।
बहन ! भगवान ने जहां तक श्वेत-कसिण की सीमा है, वहां तक उसे जान लिया। उसे जानकर भगवान ने उसके आस्वाद को जाना, उसके दुष्परिणाम को जाना, उस बंधन से मुक्त होने को जाना तथा मार्गामार्ग ज्ञान-दर्शन को जाना।
यह जो (परम) अर्थ की प्राप्ति तथा हृदय की शान्ति कहा गया है; यह उसके आस्वाद के जानने, उसके दुष्परिणाम के जानने, उस बंधन से मुक्त होने को जानने तथा मार्गामार्ग ज्ञान-दर्शन को जानने के ही कारण कहा गया है।
बहन ! किन्हीं-किन्हीं श्रमण-ब्राह्मणों ने आकाश-कसिण ध्यान को ही परम अर्थ मानकर उसे प्राप्त किया है।
बहन ! भगवान ने जहां तक आकाश-कसिण की सीमा है, वहां तक उसे जान लिया। उसे जानकर भगवान ने उसके आस्वाद को जाना, उसके दुष्परिणाम को जाना, उस बंधन से मुक्त होने को जाना तथा मार्गामार्ग ज्ञान-दर्शन को जाना।
यह जो (परम) अर्थ की प्राप्ति तथा हृदय की शान्ति कहा गया है; यह उसके आस्वाद के जानने, उसके दुष्परिणाम के जानने, उस बंधन से मुक्त होने को जानने तथा मार्गामार्ग ज्ञान-दर्शन को जानने के ही कारण कहा गया है।
बहन ! किन्हीं-किन्हीं श्रमण-ब्राह्मणों ने विज्ञान-कसिण ध्यान को ही परम अर्थ मानकर उसे प्राप्त किया है।
बहन ! भगवान ने जहां तक विज्ञान-कसिण ध्यान की सीमा है, वहां तक उसे जान लिया। उसे जानकर भगवान ने उसके आस्वाद को जाना, उसके दुष्परिणाम को जाना, उस बंधन से मुक्त होने को जाना तथा मार्गामार्ग ज्ञान-दर्शन को जाना।
यह जो (परम) अर्थ की प्राप्ति तथा हृदय की शान्ति कहा गया है। यह उसके आस्वाद के जानने, उसके दुष्परिणाम के जानने, उस बंधन से मुक्त होने को जानने तथा मार्गामार्ग ज्ञान-दर्शन को जानने के ही कारण कहा गया है।
भगिनी ! यह जो कुमारि-प्रश्नों में भगवान के द्वारा संक्षेप में कहा गया कि -
"अत्थस्स पत्तिं हदयस्स सन्तिं,
जेत्वान सेनं पियसातरूपं ।
एकोहं झायं सुखमनुबोधिं,
तस्मा जनेन न करोमि सखिं,
सखी न सम्पज्जति केनचि मे'ति ।"
भगिनि! भगवान के द्वारा संक्षेप में बताए गए उपदेश का विस्तारित अर्थ समझना चाहिए।"
नमो बुद्धाय🙏🙏🙏
Ref:काळी सुत्त: अंगुत्तर-निकाय
04.07.2024


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