शीलवान होता है, वह प्रज्ञावान और धार्मिक है।
एक समय तथागत श्रावस्ती के जेतवन में विहार करते थे। तब धम्मिक थेर, उसके पुत्र और पत्नी के अर्हत्व प्राप्ति का सन्धान करके भिक्खुओं को उपदेश देते हुए कहा -
" न अत्तहेतु न परस्स हेतु,
न पुत्तमिच्छे न धनं न रट्ठं।
न इच्छेय्य अधम्मेन समिद्धिमत्तनो,
स सीलवा पञ्ञावा धम्मिको सिया ।। "
जो अपने लिए या दूसरों के लिए पुत्र, धन और राज्य नहीं चाहता है और न अधर्म से अपनी उन्नति चाहता है, वही शीलवान, प्रज्ञावान और धार्मिक है।
भगवान ने कहा -
" भिक्खुओं ! एक मेधावी, धन की इच्छा नहीं करता हैं, बुरे कर्म करके सम्पत्ति अर्जित नहीं करता हैं, वह अपने लिए या दूसरों के लिए भी नहीं करता हैं। वह तो भव सागर से, जन्म-जन्मांतर से छुटकारा पाने के लिए, अपनी मुक्ति के लिए प्रयत्नरत रहता है और धम्म के अनुसार आचरण करता हैं। उसका न कोई प्रिय होता है, न कोई अप्रिय। उसका न कोई अपना होता है और न कोई पराया। वह तो साधना में रत रहकर अपनी मुक्ति में लगा रहता है, मुक्ति के मार्ग पर चलता है, निर्वाण के मार्ग पर आरूढ़ होता है। उसकी कामना न तो धन होती है, न ऐश्वर्य, वह अपने भले के लिए दूसरे का अहित भी नहीं चाहता है ।
जो ऐसा है वह शीलवान, प्रज्ञावान और धार्मिक है । "
नमो बुद्धाय🙏🏼🙏🏼🙏🏼
18.07.2023


0 टिप्पण्या