धन्य है मंगलमयी मैत्रीभावना!
[ भन्ते पूर्ण की अमरगाथा ]
सूनापरान्त के सुप्पारकप्पत्तन बंदरगाह [ वर्तमान मुंबई के पास नाला सोपारा ] का निवासी, 'पूर्ण' नामक व्यापारी व्यवसाय हेतु श्रावस्ती गया था। वहां भगवान के सम्पर्क में आया तो धम्म के सम्पर्क में आया। बहुत वैराग्य जागा और वही प्रवर्जित हो भिक्षु
संघ में सम्मिलित हो गया। वह भगवान के उपदेशों का दृढतापूर्वक पालन करता था। कुछ समय पश्चात पूर्ण को स्वदेश लौटने का मन हुआ तो भगवान से आज्ञा लेने गया।
भगवान ने कहा- पूर्ण! सूनापरान्त जनपद के लोग बड़े कठोर है। चण्ड स्वभाव वाले हैं। वे तुझ पर आक्रोश करेंगे। तुझे कटुवचन बोलेंगे। तो तुझे कैसा लगेगा ?”
पूर्ण-
“मुझे अच्छा ही लगेगा, भगवान! मेरे मन में यही भाव जागेगा कि
सूनापरान्त के लोग बड़े भद्र हैं, सुभद्र हैं। बहुत भले हैं। मुझ पर नाराज होने पर के कटुवचन कह कर आक्रोश प्रकट करते है, मुझे हाथ से तो नहीं मारते।”
भगवान-
-“यदि वह तुझे हाथ से मारे, तो कैसा लगेगा, पूर्ण ?”
पूर्ण-
“अच्छा ही लगेगा, भगवान ! मेरे मन में यही भाव जागेगा कि यह कितने भद्र है, सुभद्र हैं। कितने भले है। केवल हाथों से मारकर रह गये, ढेलों से तो नहीं मारा।”
भगवान-
“और यदि वह ढेलों से मारें, तो कैसा लगेगा, पूर्ण ?”
पूर्ण-
“अच्छा ही लगेगा, भगवान! मेरे मन में यही भाव जागेगा कि कितने भले हैं, यह कितने भद्र हैं, सुभद्र है यह लोग। केवल ढेले से मार कर रह गये। डण्डे से तो नहीं मारते मुझे। सचमुच भले हैं।”
भगवान-
-“और यदि डण्डे से मारे, तो कैसा लगेगा, पूर्ण ?”
पूर्ण-
-“अच्छा ही लगेगा, भगवान ! मेरे मन में यही भाव जागेगा कि कितने भद्र हैं, सुभद्र हैं, कितने भले है यहां के लोग। केवल डण्डे से मार कर रह गये। शस्त्र से नहीं मारते मुझे। सचमुच बड़े भले हैं।”
भगवान-
“और यदि शस्त्र से मारे, तो कैसा लगेगा, पूर्ण ?”
पूर्ण-
“अच्छा ही लगेगा, भगवान ! मन में यही भाव जागेगा कि कितने भद्र हैं, सुभद्र हैं यहां के लोग। कितने भले हैं। सामान्य शस्त्र से मार कर
घायल ही तो किया। किसी तेज शस्त्र से मार कर मेरे प्राण तो नहीं हर लिये ।”
भगवान-
“और यदि वह तुझे तेज शस्त्र से मार डाले, तो कैसा लगेगा, पूर्ण ?”
पूर्ण-
“अच्छा ही लगेगा, भगवान ! कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो दुःखमय जिन्दगी से ऊब कर मरने के लिए किसी शस्त्रधारी प्राणघातक को ढूंढते हैं। सो मुझे यह शस्त्रधारी प्राणघातक बिना ढूंढे ही मिल गये। कितने भले हैं यहां के लोग।”
भगवान ने कहा-
“साधु! साधु! साधु!”
भगवान ने साधुकार देकर कहा-
“पूर्ण! तू ऐसे धम्ममय चित्त से अपनी मातृभूमि में सफल्तापूर्वक निवास कर सकता है और धम्म-सेवा कर सकता है।”
यों भगवान का आशीर्वाद लेकर भिक्षु पूर्ण स्वदेश लौटा। भगवान से जो साधना विधि सीखी थी उसका अभ्यास करते हुए पहले ही वर्षावास में उसने अरहन्त अवस्था प्राप्त कर ली। पहले ही वर्षावास में उस प्रदेश के एक हजार नर-नारियों को शुद्ध धम्म में प्रतिष्ठापित कर दिया। तदनन्तर उनकी संख्या दिनोंदिन बढ़ती गई। अनेक लोगों को धम्म लाभ मिला ।
भगवान के प्रशिक्षण के अनुकूल सधे हुए असीम मैत्री-बल से भिक्षु
पूर्ण ने उस प्रदेश में जो शुद्ध धम्म का बीज बोया था, वह कालान्तर में
खूब फला। आज के महाराष्ट्र का समस्त उत्तरी तथा पूर्वी प्रदेश अरहन्त पूर्ण
की धम्म सेवा के कारण शुद्ध धम्म की पावन गंगा से लहलहा उठा। मैत्री
बल से कठोर स्वभावी लोग मृदु स्वभावी हो गये। इस प्रदेश में स्थान- स्थान पर कठोर चट्ठानों में कटी हुई ध्यान गुफाएं मैत्री-प्रबल अरहन्त पूर्ण और उसके योग्य शिष्यों-प्रशिष्यों की अपूर्व सफलता की आज भी मधुर याद दिलाती है; वहां की पावन लहरियां उनकी गौरव गाथाएं गाती हैं।
नमो बुद्धाय🙏🙏🙏
09.11.2023


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