"निब्बानं परमं सुखं।"
निर्वाण सबसे बड़ा सुख है।
निर्वाण का अर्थ क्या है?
निर्वाण का अर्थ है बुझना।
"खीणं पुराणं नवं नत्थि सम्भवं,
विरत्तचित्तायतिके भवस्मिं।
ते खीणबीजा अवरूळिहछन्दा,
निब्बन्ति धीरा यथा'यं पदीपो।"
- रतन सुत्त
अर्थात-
पुराने कर्म क्षीण हो गये,
नये कर्म उत्पन्न नहीं होते,
तब चित्त पुनर्जन्म से विरक्त होता हैं, क्षीणबीज होते जाते हैं और तृष्णा ही समाप्त हो जाती हैं ।
प्रतीत्य-समुत्पन्न (विच्छिन्न प्रवाह रूप से उत्पन्न) नाम-रूप ( विज्ञान, चित्त और भौतिक तत्व) तृष्णा के गारे से मिल कर जो एक जीवन प्रवाह का रूप धारण कर प्रवाहित हो रहा है,इस प्रवाह का अत्यन्त विच्छेद ही निर्वाण है। पुराने तेल-बत्ती या ईंधन चुकने तथा नये की आमदनी न होने से दीपक या अग्नि बुझ जाती है, उसी तरह आस्रवों (चित्तमलों, कामभोग और आत्मा के नित्यत्व आदि की मिथ्या दृष्टि) के क्षीण होने पर यह आवागमन नष्ट हो जाता है।
निर्वाण से क्या प्राप्त होता है?
निर्वाण से भव विमुक्ति होती है। यानी सारी गतियों से नितांत विमुक्ति होती है। भवचक्र ख़त्म हो जाता है। दु:खों से मुक्ति मिल जाती है।
निर्वाण के लिए क्या करना होगा?
निर्वाण प्राप्त करने के लिए दस संयोजनों यानी बंधनो नष्ट करना होगा।
कौन से १० बंधन है?
यह है दस बंधन ( संयोजन )
१) सत्काय दृष्टि
२) विचिकित्सा
३) शील-व्रत- परामर्श
४) काम- छंद
५) प्रतिघ
६) रूप- राग
७) अरूप- राग
८) मान
९) औद्धत्य
१०) अविद्या ।
इन दस संयोजनों को नष्ट करते हुए क्रमशः चार अवस्थाएं होती है।
१) सोतापन्न
२) सकदागामी
३) अनागामी
४) अरहंत
तथागत बुद्ध ने
उत्तरोत्तर आठ श्रेष्ठ आध्यात्मिक अवस्थाएं बतायीं हैं:
1. सोतापन्न मार्गारूढ़
2. सोतापन्न फल प्राप्त
3. सकदागामी मार्गारूढ़
4. सकदागामी फल प्राप्त
5. अनागामी मार्गारूढ़
6. अनागामी फल प्राप्त
7. अरहंत मार्गारूढ़
8. अरहंत फल प्राप्त ।
यदिदं चत्तारि पुरिस-युगानि अट्ठपुरिसपुग्गला,एस भगवतो सावकसंघो ।
नमो तस्स अट्ठअरिय पुग्गल महासंघस्स।
नमो बुद्धाय🙏🙏🙏
09.06.2024


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