[चुन्दसूकरिक कसाई दु:ख से तड़प रहा था ]
"इध सोचति पेच्च सोचति ,
पापकारी उभयत्थ सोचति ।
सो सोचति सो विहञ्ञति ,
दिस्वा कम्मकिलीट्ठमत्तनो ।।"
वेळुवन विहार में रहने के दौरान भगवान गौतम बुद्ध ने यह गाथा कही थी l
वेळुवन विहार के पास चुन्दसूकरिक नाम का एक बहुत क्रूर और कठोर दिल का कसाई रहता था l वह सूअर को मार के बेचने का कार्य करता था l वह पिछले 55 सालो से यह काम कर रहा था, इन 55 सालो में उस ने अनेक सुअर की हत्या की थी l और कोई भी पुण्य का काम नहीं किया था।
उसका घर विहार के पास ही था l लेकिन उसने कभी भी किसी भिक्षु को भिक्षा - भोजन नही दिया l ना ही कभी भिक्खुसंघ को आदर व्यक्त किया l
कुछ दिन बाद वह बिमार पडा l मृत्यू से पहले, वह अत्याधिक दर्द और पीड़ा में था कि वह तड़प रहा था और चिल्ला रहा था और पूरे सात दिनों तक सुअर की तरह अपने हाथों और घुटनों के बल चलता रहा और मर कर अविचि नरक में उत्त्पन्न हुआ l
जो अकुशल काम को करता है वह न केवल इस लोक में बल्कि दूसरे लोक में भी पीड़ा भोगता है।
तब तथागत ने यह गाथा कही l
"इध सोचति पेच्च सोचति ,
पापकारी उभयत्थ सोचति ।
सो सोचति सो विहञ्ञति ,
दिस्वा कम्मकिलीट्ठमत्तनो ।।"
- यहां (इस लोक में) शोक करता है, मरणोपरांत (परलोक में) शोक करता है, पाप करने वाला (व्यक्ति) दोनों जगह शोक करता है, वह अपने कर्मो की मलिनता देखकर शोकापन्न होता है, संतापित होता है ।
नमो बुद्धाय🙏🙏🙏
Ref:धम्मपद: यमकवग्गो
11.06.2024


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