[उपोसथ कर्मकांड नहीं है, उपोसथ
अष्टांग मार्ग का अनुस्मरण और अनुशरण करना है।]
"चातुद्दसिं पञ्चदसिं,
या च पक्खस्स अट्ठमी !
पाटिहारियपक्खञ्च अट्ठंगसुसमागतं ।
उपोसथं उपवसेय्य, योपिस्स मादिसो नरो'ति ।।" - तथागत
- जो भी नर मेरे सदृश होना चाहे, वह पक्ष की चतुर्दशी, पूर्णिमा, अष्टमी तथा प्रातिहारिय-पक्ष (अतिरिक्त छुट्टी) को आठ शीलों वाला उपोसथ करें ।
- तथागत
सुख की इच्छा रखने वाले सभी यथासंभव पूर्णिमा, चतुर्दशी (अमावस्या के एक दिन पहले) & अष्टमी को उपोसथ करना चाहिए। और अगर किसी भी करण से इस दिन उपोसथ करना संभव न हो तो, अपनी इच्छानुसार, जब संभव हो तब यथासंभव सप्ताह में "किसी भी दिन" उपोसथ करना चाहिए ।
उपोसथ कर्मकांड नही है। भूखा रहना उपोसथ नही है। उपोसथ है- अष्टांग मार्ग का अनुस्मरण और अनुशरण करना।
कौन से आठ शील ?
1) हत्या नहीं करें ।
2) चोरी नहीं करें ।
3) ब्रम्हचर्य पालन करें ।
4) झूठ नहीं बोले । निंदा, चुगली नहीं करें । अपशब्द न कहें । व्यर्थ की बातें, गपशप न करें ।
5) किसी भी प्रकार के मादक पदार्थ का सेवन न करें ।
6) विकाल भोजन न करें।
दोपहर 12-00 बजे के बाद सदा पानी, नींबू-पानी, गुड-पानी, अद्रक पानी, काली चाय का सेवन कर सकते हैं । बहुत आवश्यक हो तो, शाम के समय "फल का रस" ले सकते हैं ।
बीमार, वृद्ध, गर्भवती महिलाएँ, बच्चें और दिनभर के भूखें लोग अगर चाहें तो शाम को छास (Butter milk) या हल्का-सा, थोड़ा-सा आहार लेने की अनुमति हैं ।
7) नाच, गाना, संगीत, अश्लील दृश्य, माला, सुगंध, श्रृंगार, आभूषणों से दूर रहें ।
8) आराम दायक उच्च-शयनासन त्यागें ।
इन आठ शीलों का कड़ाई से पालन करें।
और
9) विपश्यना साधना करें।
10) धम्म श्रवण और/या धम्म पठण करें ।
11) मंगल मैत्री का अभ्यास करें ।
12) श्रम-दान, धम्म- दान, संघ-दान करें ।
इन बारह (12) नियमों का पालन करना चाहिए। यह सही उपोसथ हैं ।
उपोसथ किस लिए ?
साधना में अधिक से अधिक परिपक्व होने के लिए। "रत्तिन्दिवमतन्दितो" = रात-दिन की सजगता के अभ्यास में पूष्ट होने के लिए।
और
"सम्पजञ्ञं न रिञ्चति"= एक क्षण के लिए भी बिना संप्रज्ञान के न रहें, इस अभ्यास में पूष्ट होने के लिए।
नमो बुद्धाय🙏🙏🙏
08.07.2024


0 टिप्पण्या