[करूणा का प्रभाव सब पर एक जैसा क्यों नहीं होता है ? ]
भगवान बुद्ध से प्रश्न पूछा गया कि क्या आप सब पर समान रूप से करूणा भाव रखते हैं ? यदि हां, तो किसी को बहुत लाभ होता है, किसी को मध्यम तो कोई-कोई धम्म लाभ से वंचित रह जाता है, ऐसा क्यों? आपकी मंगलमय करूणा का प्रभाव सब पर एक जैसा क्यों नहीं होता है ?
भगवान ने उसे एक किसान का उदाहरण देते हुए समझाया कि उसके पास तीन तरह की जमीन है-
1) बहुत उपजाऊ
2) मध्यम उपजाऊ
3) बिल्कुल उसर-बंजर
ऐसे में वह सबसे पहले उपजाऊ जमीन पर बीज डालता है, उसके बाद मध्यम में और सबसे अंत में उसर-बंजर में। बीज वही है और उतनी ही मेहनत और लगन से डाला जाता है। लेकिन फसल एक सी नहीं होती है।
इस प्रकार मेरे पास भी तीन प्रकार के लोग धम्म सीखने आते हैं। एक तो बहुत गंभीर साधक/साधिका, जो उपजाऊ जमीन के समान है। उनमें जो बीज पडेगा, तुरंत फलित होगा। क्योंकि वे पूरी श्रद्धा और लगन से काम में लग जाते हैं। दूसरे सामान्य गृहस्थ उपासक/ उपासिका जो अपने सांसारिक कामों में लगे रहते हुए भी धम्म सीखते हैं। वे मध्यम खेत के समान है। उनमें श्रद्धा और लगन तो है, परंतु जीवन में अनेक कठिनाइयां है। फिर भी वे धम्म मार्ग पर चलकर अपना मंगल साधते हैं। तीसरे कुछ ऎसे लोग हैं जो कर्म कांडों व अन्य जंजालों में उलझे होने के कारण धम्म को ठीक से ग्रहण नहीं करते है। कोई- कोई केवल सुन कर चला जाता है । जरा भी अभ्यास नहीं करता तो वह धम्म से सदा वंचित रह जाता है।
परंतु मेरी करुणा उन सबके लिए सदैव उतनी ही रहती है।
भगवान ने एक और उदाहरण देते हुए समझाया कि किसी के पास तीन घडे हों। एक बिल्कुल छिद्र रहित, दूसरा सुक्ष्म छिद्र वाला और तीसरा बड़े छिद्र वाला। वह बिना छिद्र वाले घडे में पानी भरता है, जो दिन भर उसके काम आता है। वह दूसरे घडे में भरता है, भले ही दिन भर न चले पर कुछ समय तक तो उसके काम आता है। तीसरा घडा वह इसलिए भरता है कि जितना भी पानी एकत्र हो वह उसके नहाने व बर्तन धोने के काम आ जाये।
बहुत गंभीर साधक/साधिका पहले घडे के समान है। दूसरे घडे के समान सामान्य उपासक/ उपासिका है जो कठिनाई होते हुए भी धम्म धारण करते हैं। अन्य कर्म कांडों में उलझे हुए लोग तीसरे घडे के समान है। वे जितना अभ्यास करेंगे, जितना ग्रहण करेंगे बस उतना ही लाभ होगा, यद्यपि मेरी करूणा उनके प्रति भी उतनी ही है।
भगवान द्वारा उपदेशित इन उदाहरणों से सबक लेकर साधकों! हम भी धम्म मार्ग पर उपजाऊ क्षेत्र बन कर, श्रद्धा और लगन के साथ पंचशील का कड़ाई से पालन करते हुए, सम्यक समाधि पुष्ट करें और अनित्यबोधिनी प्रज्ञा का गहराई से अभ्यास करते हुए अपने सदाचरण के बल पर अपनी सुगति निश्चित करें। इसी में सबका मंगल है, कल्याण है।
नमो बुद्धाय🙏🏼🙏🏼🙏🏼
16.08.2024


0 टिप्पण्या