[चार बातों से भय नहीं।]
एक समय अनाथपिण्डिक गृहपति बड़ा बीमार पड़ा था ।
तब, अनाथपिण्डिक गृहपति ने एक पुरुष को आमन्त्रित किया,
और कहा- भन्ते आनंद को मेरी ओर से उनके चरणों पर शिर से वन्दना करना और कहना 'भन्ते ! अनाथपिण्डिक गृहपति बड़ा बीमार पड़ा है, सो आयुष्मान आनन्द के चरणों पर शिर से वन्दना करता है । और यह कहो - 'भंते! यदि अनुकम्पा करके आयुष्मान जहां अनाथपिण्डिक गृहपति का घर है वहां चलें तो बड़ी अच्छी बात होती । "
तब,आयुष्मान आनन्द पूर्वाह्न समय चीवर पहन और पिंडपात्र लेकर जहां अनाथपिण्डिक गृहपति का घर था वहां गए और बिछे आसन पर बैठ गए । बैठकर, आयुष्मान आनन्द अनाथपिण्डिक गृहपति से बोले , " गृहपति ! कहो, अच्छे तो हो, बीमारी घट तो रही है न ?"
" भन्ते ! मेरी तबियत अच्छी नहीं है , बीमारी घट नहीं रही है , बल्कि बढ़ती ही मालूम होती है । "
" गृहपति ! चार धम्मो से युक्त होने से अज्ञ पृथक जन को घबराहट, कंप-कंपी और मृत्यु से भय होते हैं । किन चार से ?
गृहपति ! अज्ञ पृथक - जन बुद्ध के प्रति अश्रद्धा से युक्त होता है। उस अश्रद्धा को अपने में देख उसे घबड़ाहट, कंप-कंपी और मृत्यु से भय होते हैं ।
गृहपति ! अज्ञ पृथकजन धम्म के प्रति अश्रद्धा से युक्त होता है। उस अश्रद्धा को अपने में देख उसे घबड़ाहट, कंप-कंपी और मृत्यु से भय होते हैं ।
गृहपति ! अज्ञ पृथकजन संघ के प्रति अश्रद्धा से युक्त होता है। उस अश्रद्धा को अपने में देख उसे घबड़ाहट, कंप-कंपी और मृत्यु से भय होते हैं ।
गृहपति ! अज्ञ पृथकजन दु:शील से युक्त होता है । उस दु:शील को अपने में देख उसे घबड़ाहट, कंप-कंपी और मृत्यु से भय होते हैं ।
गृहपति ! इन्हीं चार धम्मो से युक्त होने से अज्ञ पृथकजन को घबड़ाहट, कंप-कंपी और मृत्यु से भय होते हैं । "
" गृहपति ! चार धम्मो से युक्त होने से पंडित अरिय-सावक को न घबराहट, न कंप-कंपी और न मृत्यु से भय होते हैं । किन चार से ?
गृहपति ! पंडित अरिय-सावक बुद्ध के प्रति श्रद्धा से युक्त होता है । उस श्रद्धा को अपने में देख उसे न घबड़ाहट, न कंप-कंपी और न मृत्यु से भय होते हैं ।
गृहपति ! पंडित अरिय-सावक धम्म के प्रति श्रद्धा से युक्त होता है। उस श्रद्धा को अपने में देख उसे न घबड़ाहट, न कंप-कंपी और न मृत्यु से भय होते हैं ।
गृहपति ! पंडित अरिय-सावक संघ के प्रति श्रद्धा से युक्त होता है । उस श्रद्धा को अपने में देख उसे न घबड़ाहट, न कंप-कंपी और न मृत्यु से भय होते हैं ।
गृहपति ! पंडित अरिय-सावक श्रेष्ठ और सुन्दर शील से युक्त होता है । उस श्रेष्ठ और सुन्दर शील को अपने में देख उसे न घबड़ाहट, न कंप-कंपी और न मृत्यु से भय होते हैं ।
गृहपति ! इन्हीं चार धम्मो से युक्त होने से पंडित अरिय-सावक को न घबड़ाहट, न कंप-कंपी और न मृत्यु से भय होते हैं । "
भन्ते आनन्द ! मुझे भय नहीं होता। मैं किससे डरूँगा ?
भन्ते !
मैं बुद्ध के प्रति दृढ़ श्रद्धा से युक्त हूँ, मैं धम्म के प्रति दृढ़ श्रद्धा से युक्त हूँ , मैं संघ के प्रति दृढ़ श्रद्धा से युक्त हूँ तथा भगवान ने जो गृहस्थोचित शिक्षापद बताये हैं,उनमें से मैं अपने में किसी को खण्डित हुआ नहीं देखता हूँ । "
गृहपति ! लाभ हुआ, सुलाभ हुआ !! यह आपने स्रोतापत्ति-फल की बात कही है ।
नमो बुद्धाय🙏🙏🙏
Ref: अनाथपिण्डिक सुत्त:संयुत्त-निकाय
14.08.2024


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