[ महाबोधि महाविहार, बोधगया में बोधिवृक्ष तले ध्यान साधना करते हुए "प्रतीत्यसमुत्पाद" सिद्धांत का स्मरण हुआ।]
[प्रतीत्यसमुत्पाद क्या है?]
सम्यक सम्बोधि के बाद तथागत ने चौथा सप्ताह बोधिवृक्ष के नजदीक एक स्थान पर ध्यान में बिताया। उस स्थान को "रतनघर" नाम से चिन्हित किया गया है। इसी स्थान पर तथागत ने प्रतीत्यसमुत्पाद पर चिंतन मनन किया था।
प्रतित्यसमुत्पाद क्या है?
प्रतीत्यसमुत्पाद है कारण- कार्य का नियम । सकल विश्व कार्य- कारण के नियम से बंधा हुआ है।
इस नियम को गाथा के माध्यम से निम्न प्रकार से बताया गया है।
अनुलोम
( अवरोह पतनोन्मुख )
इसे भवचक्र कहते है।
"अविज्जापच्चया सङ्खारा,
सङ्खारपच्चया विञ्ञाणं,
विञ्ञाणपच्चया नामरूपं,
नामरूपपच्चया सळायतनं,
सळायतनपच्चया फस्सो,
फस्सपच्चया वेदना,
वेदनापच्चया तण्हा,
तण्हापच्चया उपादानं,
उपादानपच्चया भवो,
भवपच्चया जाति,
जातिपच्चया जरा- मरण-सोक- परिदेव- दुक्ख-दोमनस्स- उपायासा सम्भवन्ति।
एवमेतस्स केवलस्स दुक्खखन्धस्स समुदयो होति।।"
इस प्रकार, सारा का सारा दुःख- समुदय ही उठ खड़ा हो जाता है।
प्रतिलोम
(आरोहण- उन्नोन्मुख)
इसको घम्मचक्र कहते है।
"अविज्जाय त्वेव असेस - विराग- निरोधा सङ्खारनिरोधो,
सङ्खारनिरोधा विञ्ञाणनिरोधो,
विञ्ञाणनिरोधा नामरूपनिरोधो,
नामरूपनिरोधा सळायतननिरोधो,
सळायतननिरोधा फस्सनिरोधो,
फस्सनिरोधा वेदनानिरोधो,
वेदनानिरोधा तण्हानिरोधो,
तण्हानिरोधा उपादाननिरोधो,
उपादाननिरोधा भवनिरोधो,
भवनिरोधा जातिनिरोधो,
जातिनिरोधा जरा- मरण-सोक- परिदेव- दुक्ख-दोमनस्स- उपायासा निरूज्झन्ति।
एवमेतस्स केवलस्स दुक्खखन्धस्स निरोधो होति।।
इस प्रकार, सारा का सारा दु:ख - समुदय ही रूक जाता है।
अनुलोम यह भवचक्र है।
भवचक्र को बंद करने के लिए तृष्णा का समुच्छेद प्रहाण करना ही होगा । " वेदनापच्चया तण्हा" को "वेदनापच्चया पञ्ञा " में बदलना होगा, वही धम्मचक्र है।
भवचक्र से धम्मचक्र की ओर जाने का सीधा मार्ग निर्वाण की ओर जाता है। यही दु:ख मुक्ति का मनोवैज्ञानिक मार्ग है।
*एस धम्मो सनन्तनो*
नमो बुद्धाय🙏🏼🙏🏼🙏🏼
बोधगया (विहार)
15.09.2024


0 टिप्पण्या