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🌻धम्म प्रभात🌻

🌻धम्म प्रभात🌻 

[ क्या मांसाहार करना अधम्म है? ]
एवं मे सुतं- ऐसा मैंने सुना है -

एक समय भगवान राजगृह में रोगविशेषज्ञ जीवक वैद्य द्वारा बनाए गए आम्रवन में विहार करते थे। उस समय जीवक जहां भगवान विराजमान थे, वहां गए। वहां जाकर भगवान का अभिवादन कर एक ओर बैठ गए। 

एक ओर बैठे हुए जीवक ने भगवान से पुछा- 
 
भन्ते! सुना है- लोग आपको मांस-भोजन कराने के उद्देश्य से प्राणियों का वध करते हैं और आप जानते- बूझते उस मांस का भोजन कर लेते हैं, उसे स्वीकार कर लेते हैं। 

भन्ते! जो लोग यह कहते हैं- हमने यह मांस भोजन श्रमण गौतम के लिये बनाया है, वे बुद्ध इस बात को जानते हुए भी उसे स्वीकार कर लेते हैं। भन्ते! क्या वे लोग आपके विषय में सत्य कहते हैं, या मिथ्या कहकर आप पर झूठा आरोप  लगाते है? क्या वे धम्मानुसार ही बात करते हैं? इससे किसी धम्मानुसार वचन-अनुवचन की निन्दा तो नहीं होती? 

भगवान ने कहा-
जीवक! जो लोग यह कहते हैं- हमने यह मांस भोजन श्रमण गौतम के लिये बनाया है, वे बुद्ध इस बात को जानते हुए भी उसे स्वीकार कर लेते हैं। वे मुझ पर झूठा आरोप लगाते हैं, वे मेरे बारे में सच्चाई नहीं कहते, न हुई बात ही कहते हैं । 

जीवक! मैं तीन बातों से मांस को 'अभोज्य' मानता हूं - 

1) अपने लिए मांस कटते हुए देखना। 

2) अपने लिए मांस कटते हुए सुनना। 

3) वैसा (अपने लिए कटने का) शंका-सन्देह होना।
 
जीवक! इन तीन बातों से युक्त मांस को मैं अभोज्य (अग्राह्य) मानता हूं। 

किन्तु जीवक! इन तीन बातों से युक्त किसी भी मांस को मैं अपने लिए भोज्य' मानता हूं- 

1) अपने लिए कटते हुए मांस को न देखना ।

2) अपने लिए मांस कटते हुए न सुनना  

3) न वैसा (अपने लिए कटने का) सन्देह होना। 

जीवक! इन तीन बातों से युक्त मांस को मैं भोज्य’ मानता हूं।

मैत्रीभावना करने वाला अनिन्द्य आहार करता है।

जीवक! यहां कोई भिक्षु किसी गांव या कस्बे के पास रहकर साधना करता है। वह मैत्रीसहगतचित्त से एक तरफ जाता है, उसी तरह दूसरी, तीसरी, चौथी तरफ भी जाता है। इस तरह -सब तरफ निर्वैर, दयामय, विपुल मैत्रीयुक्त भावना से समय वह ऊपर नीचे, आगे पीछे, आड़े-टेढ़े लोक में विचरण करता है। 

उसको कोई गृहपति या उसका पुत्र वहां पहुंचकर उसे दूसरे दिन के लिए भोजनहेतु निमन्त्रित करे । वह भिक्षु यदि चाहे तो निमन्त्रण स्वीकार कर लेता है। वह उस रात्रि के बीतने के बाद, दूसरे दिन पूर्वाह्नकाल में पहनकर, पात्र चीवर ले उस गृहपति या गृहपतिपुत्र के घर पहुंचता है, पहुंचकर बिछाए हुए आसन पर बैठता है। उसको गृहपति या गृहपतिपुत्र अच्छे अच्छे खाद्य पदार्थ परोसता है। 

उस समय उस भिक्षु को यह नहीं होता - अच्छा हो कि यह गृहपति या गृहपतिपुत्र मुझे अच्छे-अच्छे खाद्य पदार्थ परोसे। उसे यह भी नहीं होता - अच्छा हो कि यह गृहपति या गृहपतिपुत्र आगे भी मुझे ऐसे ही अच्छे-अच्छे खाद्य पदार्थ परोसा करें। वह उस खाद्यपदार्थ (पिण्डपात) को बिना किसी लोभ, लालच या आसक्ति के शरीरयात्रा निर्वाहमात्र के लिए सावधान होकर ग्रहण करता है। 

तो क्या समझते हो, जीवक! उस समय उस भिक्षु को आत्मपीड़ा, परपीड़ा या उभयपीड़ा का ध्यान आने की बात (उसके) मन में उठेगी?

नहीं, भन्ते।।
जीवक! तो वह भिक्षु उस समय अनवद्य (निष्पाप) आहार ही ग्रहण करता है न?

"हां भन्ते! मैंने सुना था कि ब्रह्म मैत्रीविहार की साधना करते थे। किन्तु मैंने आपको साक्षात देख लिया। 

जीवक! जिस राग, द्वेष या मोह से साधारण जन हिंसा में व्याप्त होते हैं, वह राग, द्वेष या मोह तथागत का समूल नष्ट हो चुका है, कटे सिर वाले ताड़ जैसा अभावयुक्त और भविष्य में उत्पन्न होने के लिए अयोग्य हो चुका है। 

जीवक! यदि तुमने मेरे लिए उपर्युक्त बातें यही सोचकर कही हैं तो ठीक है, इस विषय में मैंने तुम्हें अपनी वास्तविक स्थिति बता दी।
"हां, भन्ते! यही सोचकर मैंने आपके विषय में उक्त बातें कही थीं।

जीवक! जो कोई व्यक्ति तथागत या तथागत श्रावक के उद्देश्य से प्राणिवध करता है, वह पांच स्थानों से अपुण्य कमाता है। 

1) जो वध के लिए प्राणी लाने की आज्ञा देता है, वह इस प्राणिवध की आज्ञा के कारण अपुण्य भागी होता है। 

2) जो इस प्राणी को, गला बांध कर मारते-पीटते हुए वधस्थान तक लाता है, वह प्राणी को वध स्थान पर लाने के कारण पाप का भागी होता है। 

३) और जो प्राणिवध की आज्ञा देता है, वह तीसरा भी पापभागी है। 

(4) मारे जाते समय प्राणी जिस दुःख या पीड़ा से कराहता है, उसका वह कराहना भी उन लोगों के लिए पाप ही उत्पन्न करता है। 

5) वह व्यक्ति भी पाप का ही भागीदार होता है, जो वह (प्राणिवध द्वारा पकाया) मांस तथागत या तथागत श्रावक को परोसता है। 

जीवक! इस तरह जो प्राणी तथागत या तथागत श्रावक के उद्देश्य से प्राणिवध करता है, वह पांच स्थानों से अपुण्य कमाता है। 

नमो बुद्धाय🙏🏼🙏🏼🙏🏼 
Ref: जीवक सुत्त: मज्झिम निकाय 
16.06.2023

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