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🌻धम्म प्रभात🌻



🌻धम्म प्रभात🌻 

[ जाति -जन्म ]
(प्रतीत्य समुत्पाद की ग्यारहवीं कडी) 

भव पच्चया जाति। 
भव के कारण (प्रत्यय) से जाति यानि जन्म। 

जाति का अर्थ जन्म हैं, विज्ञान (प्रतिसन्धि-विज्ञान हैं। 
नाम एवं रूपों के सर्वप्रथम उत्पाद को जाति या प्रतिसन्धि कहते हैं। जाति कर्मभव एवं उत्पत्ति भव दोनों भावों से उत्पन्न होते हैं। 

भव के कारण ही जाति होती हैं। 
भव के निरोध से जाति का निरोध होता हैं। 

तथागत बुद्ध ने कहा - - 
"भिक्षुओं ! पैदा होना (जाति) किसे कहते हैं? 
यह जो जिस किसी प्राणी का जिस किसी योनि में जन्म लेना हैं , पैदा होना हैं, उतरना हैं, उत्पन्न होना हैं, स्कंधों(रूप, वेदना, संज्ञा संस्कार, विज्ञान) का प्रादुर्भाव होना हैं, आयतनों(चक्षु, श्रोत्र, नाक, काया, मन) की उपलब्धि हैं-इसे ही भिक्खुओ ! पैदा होना कहते हैं, जाति कहते हैं। चार महाभूतों(धातुओं) -पृथ्वी धातु, जल धातु, अग्नि धातु, वायु धातु तथा मन के कारण जो रूप उत्पन्न होता हैं, वहीं जाति (जन्म) हैं, उसे उपादान स्कंध कहते हैं। 

मृत्यु में अन्य तत्व जैसे शरीर, भावनाएं भावनाएं एवं प्रत्यक्ष अनुभव सब विलोप हो जाते हैं, विज्ञान फिर भी रह जाता हैं और यही पुरानी और नए जीवन को मिलाने वाली कडी हैं। 

यही अनागत भव की जाति हैं। 

जाति का अभिप्राय हैं माता की कुक्षी में भी आने पर रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान आदि पांच स्कंधों का प्रस्फुटन। 

भगवान बुद्ध कहा- 
'जातिपि दुक्खा'-जन्म ही दुःख सत्य हैं। क्योंकि जन्म होने से मरण होता हैं। 

नमो बुद्धाय🙏🙏🙏 
08.06.2023

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