["बस भिक्खुओ! भंडन, कलह, विग्रह, विवाद मत करो। "]
एक समय तथागत कोसम्बी के घोसिताराम में विहार करते थे। उस समय कोसम्बी में भिक्खु भंडन करते, कलह करते, विवाद करते, एक दूसरे को मुख रूपी बर्छी से बेधते फिरते थे। तब कोई भिक्खु, जहां भगवान थे, वहां जाकर भगवान को अभिवादन कर एक ओर खडा हो गया। एक ओर खडे हुए उस भिक्खु ने भगवान से यों कहा- " यहां कोसम्बी में भन्ते! भिक्खु भंडन करते, कलह करते, विवाद करते, एक दूसरे को मुखशक्ति से बेधते फिरते हैं। अच्छा हो यदि भन्ते ! भगवा, जहां वे भिक्खु हैं, वहां चलें। "
भगवान ने मौन से उसे स्वीकार किया।
तब भगवान जहां भिक्खु थे, वहां गए।
जाकर उन भिक्खुओं से बोले-
"बस भिक्खुओ! भंडन, कलह, विग्रह, विवाद मत करो।"
ऐसा कहने पर एक भिक्खु ने भगवान से कहा-
" भन्ते! धम्म स्वामी! रहने दें। परवाह मत करें। भन्ते! भगवा! धम्म स्वामी सुख के साथ विहार करें। हम इस भंडन, कलह, विग्रह, विवाद स्वयं निपट लेंगे। "
दूसरी बार, तीसरी बार भगवान ने भंडन, कलह, विग्रह, विवाद मत करने के लिए कहा लेकिन उन भिक्खुओं ने भगवान की बात नहीं मानी। तब भगवान पात्र- चीवर ले कोसम्बी में भिक्खाचार कर, भोजन कर , पिण्डपात से उठ, आसन समेट, पात्र-चीवर ले, खडे ही खडे बोले-
"अक्कोच्छि मं अवधि मं अजिनि अहासि मे।
ये च तं उपनय्हन्ति, वेरं तेसं न सम्मति।।"
अर्थात- मुझे निन्दा,मुझे मारा, मुझे जीता मेरा हरण कर लिया। इस तरह जो उसको मन में बांधते हैं, उनका वैर शान्त नहीं होता।
और
"अक्कोच्छि मं अवधि अजिनि मं अहासि मे
ये तं न उपनय्हन्ति, वेरं तेसूपसम्मति। ।"
अर्थात- मुझे निन्दा, मुझे मारा, मुझे जीता मेरा हरण कर लिया। इस तरह जो उसको मन में नहीं बांधते हैं, उनका वैर शान्त हो जाता है।
आगे कहा-
"न हि वेरेन वेरानि, सम्मन्ति'ध कुदाचनं।
अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो। ।"
अर्थात- वैर से वैर यहां कभी शान्त नहीं होता। अ-वैर से ही शान्त होता है, यही सदा का नियम है।
भगवान ने कहा- अनाडी लोग नहीं जानते कि हम यहां मृत्यु को प्राप्त होंगे। जो वहां मृत्यु के पास जाना जानता हैं, उनके सारे कलह शान्त हो जाते हैं। हड्डी तोडने वालों, प्राण हरने वालों, गाय- घोडा- घन हरने वालों,राष्ट्र को विनाश करने वालों तक का भी मेल होता हैं। फिर तुम में क्यों मेल नहीं हैं? ऐसा कह भगवा जहां बालक- लोणकार ग्राम था, वहां गए।
महाश्रमण के जीवन की घटना उस सत्य को दर्शाती है कि त्रिरत्न की शरण लेने के बाद भी हुए कोई- कोई भिक्खु शील पालन नहीं करते थे। आज भी ऐसी बात देखने को मिलती है। कोई-कोई भिक्खु एक दूसरे की बुराई करते दिखाई देते है।( सुरत की घटना ) ऐसे भिक्खु स्वयं की हानि करते है और ओरों की भी हानि करते हैं।
नमो बुद्धाय🙏🙏🙏
Ref: उपक्किलेस सुत्त: मज्झिम निकाय
17.07.2023


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