कुशीनगर ( कुशीनारा)
तथागत की महापरिनिर्वाण भूमि।
कुशीनगर पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध शहर गोरखपुर से 55 कि.मी. और देवरिया से करीब 35 कि.मी.देरी पर है। रेलवे से सफर करने वाले यात्री गोरखपुर या देवरिया रेल्वे स्टेशन उतर कर कुशीनगर पहुंच सकते है। बस/ टेक्सी सेवा भी उपलब्ध है।
कुशीनगर से 3 कि.मी. की दूरी पर कसाया है।
बुद्ध कालीन समय में मल्लों के दो नगर कुशीनारा और पावा थे। आज पावा को फाजिलनगर नाम से जानते है। पावा और कुशीनगर के बीच ककुत्था नदी है।
कुशीनगर के दर्शनीय स्थल है- तथागत का महापरिनिर्वाण महाविहार, माथा कुंवर, हिरण्यवती नदी (अब छोटा नाला ही बचा है) के पास मुकुट बंधन चैत्य जो आज रामाभार स्तूप नाम से जानते है। मुकुट बंधन चैत्य की जगह तथागत के शरीर का अंतिम संस्कार हुआ था। उससे थोडी दूरी पर तथागत के शरीर धातु के 8 भागों में बंटवारे हुए थे वह जगह, देश विदेश के बौद्ध विहार आदि देखने लायक है। बौद्ध विहारों में बर्मी बौद्ध विहार, थाई बौद्ध विहार, वियतनाम का बौद्ध विहार सुंदर बनाए है।
महापरिनिर्वाण विहार ( चैत्य )
यह स्थान पर तथागत ने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था। यह कुशीनगर के मल्लो का उपवत्तन नामक शालवन था। इसी उपवत्तन में दो शाल वृक्षों के नीचे तथागत ने 483 ईसा पूर्व महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था।
महान सम्राट अशोक ने महापरिनिर्वाण चैत्य पर आकर वंदना की थी और इस स्थान पर इंटो का एक विशाल गोलाकार स्तूप बनवाया था।।
इस स्तूप की खोज सर्व प्रथम कारलेयले ने सन 1876 ईस्वी में की थी। बाद में सन 1910 ईस्वी में इस स्तूप के अंदर से राजा जयगुप्त का ताम्र का सिक्का प्राप्त हुआ। स्तूप को खोलने पर 5वीं शताब्दी के सम्राट कुमार गुप्त के रजत सिक्कों की प्राप्ति हुई थी। इस स्तूप के अंदर 2. 82 मीटर ऊंचा एक स्तूप था जिसके एक आले में तथागत बुद्ध की समाधि मुद्रा में एक मूर्ति पाई गई। इस छोटे स्तूप में से सबसे महत्वपूर्ण तथागत के अस्थि अवशेष, मिट्टि और कोयले के टुकडे प्राप्त हुए।
वर्तमान में महापरिनिर्वाण विहार में तथागत की मूर्ति है उस मूर्ति की खोज सर्व प्रथम कारलेयले द्वारा सन 1876 ईस्वी में की गई। विहार एवं मूर्ति दोनों टूटी-फूटी अवस्था में प्राप्त हुई थी।
भगवान बुद्ध की 2500 वीं जयन्ती के उपलक्ष्य में मई 1956 में भारत सरकार ने भगवान बुद्ध की महापरिनिर्वाण मुद्रा वाली मूर्ति के टूटे अंशों को मरमत करके उसे पूर्णरूप में लाया गया। 24 फुट लम्बे 5 फुट 6 इन्च चौडे इंटों से बने सिंहासन के उपर इस महापरिनिर्वाण मुद्रा की मूर्ति स्थापित की। सिंहासन के अग्र भाग पर पांचवी शताब्दी का महत्वपूर्ण ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण लेख है-
"देव धर्मोंयं महाविहार स्वामिनो हरिबलस्य।
प्रतिमा चेत्यं घटिता दिन्नेन माथुरोण।। "
उपरोक्त उत्कीर्ण लेख के आधार पर इस मूर्ति का बनाने वाला स्वामी हरिबल और शिल्पकार मथुरावासी दिन्न था।
इस मूर्ति को तीन अलग-अलग दिशाओं से देखने पर तीन मुद्राओं में दिखाई देती है:
-पैरोंकी तरफ खडे होकर देखने से महापरिनिर्वाण अवस्था में दिखाई देती है,
- जब मूर्ति को सिर की तरह से देखते है तो सोच मग्न अवस्था में दिखाई देती है,
- जब इसे सामने से देखते है तो मूर्ति प्रसन्न चित्त मुद्रा में दिखाई देती है।
वर्तमान में इस विहार के अन्तर्गत भगवान बुद्ध की महापरिनिर्वाण वाली मूर्ति बौद्ध धर्मावलम्बियों के लिए मुख्य आकर्षण का केन्द्र है। देश विदेश से आने वाले श्रद्धालु लोग एवं भिक्खुगण इस मूर्ति की वंदना एवं परिक्रमा करते है और फुल, माला, चीवर चढाते है।
वंदामि चेतिया सब्बं सब्बट्ठानेसु पतिट्ठितं।
नमो बुद्धाय🙏🏼🙏🏼🙏🏼
23.08.2023


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