[लाभ-सत्कार दारूण है।]
भिक्षुओ !अनुत्तर निर्वाण की प्राप्ति के मार्ग में लाभ-सत्कार बड़ा दारूण है, कटु है, तीखा है, विघ्नकर है।
भिक्षुओ! जैसे,अंकुसी फेंकने वाला चारा लगाकर अंकुसी को किसी गहरे पानी में फेंक दे। तब, चारे के लोभ से कोई मछली उसे निगल जाय । भिक्षुओ ! इस तरह वह मछली अंकुसी को निगल कर बड़े दु:ख और विपत्ति में पड जाती है। मछुआ जो चाहे उससे करता है।
भिक्षुओ!,यहां अंकुसी फेंकने वाला मछुआ, पापी मार को समझना चाहिए और उसकी अंकुसी यही लाभ, सत्कार, प्रशंसा आदि है।
भिक्षुओ! जो भिक्षु लाभादि पाने पर बड़ा खुश होता है और आनंद उठाता है, वह मार की अंकुसी में फंसा हुआ समझा जाता है। वह दु:ख और विपत्ति में पडता है। मार उससे जैसा चाहता हो करता है।
इसलिए, भिक्षुओ! तुम्हें ऐसा सीखना चाहिए।
भिक्षुओ ! चक्षुविज्ञेय रूप अभीष्ट, सुन्दर हैं। यदि कोई भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनमें आसक्त होता है, तो कहा जाता है कि उसने बंसी को निगल लिया है। मार के हाथ में आ वह विपत्ति में पड़ चुका है। पापी मार जैसी इच्छा वैसा उसे करेगा । ऐसे ही श्रोत्र, घ्राण, जिह्वा,काया और मन, उसका यदि कोई भिक्षु उनका अभिनन्दन करता है, उनमें आसक्त होता है, तो कहा जाता है कि उसने अंकुसी को निगल लिया है। मार के हाथ में आ वह विपत्ति में पड़ चुका है। पापी मार जैसी इच्छा वैसा उसे करेगा ।
भिक्षुओ ! चक्षुविज्ञेय रूप अभीष्ट, सुन्दर है। यदि कोई भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता है, तो कहा जाता है कि उसने मार की अंकुसी को नहीं निगला है। उसने अंकुसी को काट दिया। वह विपत्ति में नहीं पड़ा है। पापी मार उसे जैसी इच्छा वैसा नहीं कर सकेगा ।
ऐसे ही श्रोत्र, घ्राण, जिह्वा, काया और मन को यदि कोई भिक्षु उनका अभिनन्दन नहीं करता है, तो कहा जाता है कि उसने मार की अंकुसी को नहीं निगला है। उसने अंकुसी को काट दिया। वह विपत्ति में नहीं पड़ा है। पापी मार उसे जैसी इच्छा वैसा नहीं कर सकेगा ।
वह मार को भी छका देने वाला है,
नमो बुद्धाय🙏🏻🙏🏻🙏🏻
Ref: वालिस सुत्त:संयुतनिकाय
02.10.2023


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