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🌻धम्म प्रभात🌻

🌻धम्म प्रभात🌻 

[कुण्डलिय परिव्राजक ने बुद्ध, धम्म और  संघ की शरण ली]

एक समय भगवान साकेत में अञ्जनवन मृगदाय में विहार करते थे।

तब, कुण्डलिय परिव्राजक जहां भगवान थे वहां आया, और कुशल-क्षेम पूछकर एक ओर बैठ गया।
एक ओर बैठे कुण्डलिय परिव्राजक भगवान से बोला -

हे गौतम !  मैं सभा-परिषद में भाग लेने वाला अपने स्थान पर ही रहा करता हूँ । सो मैं सुबह में जलपान करने के बाद एक आराम से दूसरे आराम, और एक उद्यान से दूसरे उद्यान घूमा करता हूँ । वहां, मैं कितने श्रमण और ब्राह्मणों को इस बात पर वाद-विवाद करते देखता हूॅं - 

क्या श्रमण गौतम क्षीणाश्रव होकर विहार करता है ? 

बुद्ध ने कहा-

कुण्डलिय ! विद्या और विमुक्ति के अच्छे फल से युक्त होकर बुद्ध विहार करते हैं। 

कुण्डलिय परिव्राजक  -
 हे गौतम ! किन धर्मों के भावित और अभ्यस्त होने से विद्या और विमुक्ति पूर्ण होती है? 
बुद्ध ने कहा-
कुण्डलिय ! सात बोध्यङ्गों के भावित और अभ्यस्त होने से विद्या और विमुक्ति पूर्ण होती हैं। 

कुण्डलिय परिव्राजक-
हे गौतम ! किन धर्मों के भावित और अभ्यस्त होने से सात बोध्यङ्ग पूर्ण होते हैं ? 

बुद्ध ने कहा-
कुण्डलिय ! चत्तारो-सति-पट्ठान (चार स्मृति प्रस्थान) के भावित और अभ्यस्त होने से सात बोध्यङ्ग पूर्ण होते हैं। 

कुण्डलिय परिव्राजक-
 हे गौतम ! किन धर्मों के भावित और अभ्यस्त होने से चार स्मृति-प्रस्थान पूर्ण होते हैं ? 

बुद्ध ने कहा-
कुण्डलिय ! तीन सुचरितों (काय-सुचरित, वाक-सुचरित, मन-सुचरित) के भावित और अभ्यस्त होने से चार स्मृति-प्रस्थान पूर्ण होते हैं। 

कुण्डलिय परिव्राजक-
 हे गौतम ! किन धर्मों के भावित भीर अभ्यस्त होने से तीन सुचरित पूर्ण होते हैं। 

इन्द्रिय-संवर :

बुद्ध ने कहा -
कुण्डलिय ! इन्द्रिय-संवर (संयम) के भावित और अभ्यस्त होने से तीन सुचरित पूर्ण होते हैं।

कुण्डलिय परिव्राजक- 
हे गौतम !  इन्द्रिय-संवर (=संयम) के भावित और अभ्यस्त होने से तीन सुचरित कैसे पूर्ण होते हैं ? -

बुद्ध  ने कहा -
कुण्डलिय ! भिक्खु - चक्षु से लुभावने रूप को देखकर लोभ नहीं करता है, प्रसन्न नहीं हो जाता है, राग पैदा नहीं करता है। उसका शरीर स्थित होता है, उसका चित्त अपने भीतर ही भीतर स्थित और विमुक्त होता है। चक्षु से अप्रिय रूपों को देख खिन्न नहीं हो जाता - उदास, मन मारा हुआ नहीं हो जाता । उसका शरीर स्थित होता है, उसका मन अपने भीतर ही भीतर स्थित और विमुक्त होता है। 

श्रोत से शब्द सुन लोभ नहीं करता है, प्रसन्न नहीं हो जाता है, राग पैदा नहीं करता है। उसका शरीर स्थित होता है, उसका चित्त अपने भीतर ही भीतर स्थित और विमुक्त होता है।
श्रोत से अप्रिय शब्द सुन खिन्न नहीं हो जाता - उदास, मन मारा हुआ नहीं हो जाता । उसका शरीर स्थित होता है, उसका मन अपने भीतर ही भीतर स्थित और विमुक्त होता है। 

घ्राण से गन्ध सूंघ कर लोभ नहीं करता है, प्रसन्न नहीं हो जाता है, राग पैदा नहीं करता है। उसका शरीर स्थित होता है, उसका चित्त अपने भीतर ही भीतर स्थित और विमुक्त होता है।
घ्राण से अप्रिय गन्ध सूंघ कर खिन्न नहीं हो जाता - उदास, मन मारा हुआ नहीं हो जाता । उसका शरीर स्थित होता है, उसका मन अपने भीतर ही भीतर स्थित और विमुक्त होता है। 

जिह्वा से रस पाकर लोभ नहीं करता है, प्रसन्न नहीं हो जाता है, राग पैदा नहीं करता है। उसका शरीर स्थित होता है, उसका चित्त अपने भीतर ही भीतर स्थित और विमुक्त होता है।
जिह्वा से अप्रिय रस पाकर खिन्न नहीं हो जाता - उदास, मन मारा हुआ नहीं हो जाता । उसका शरीर स्थित होता है, उसका मन अपने भीतर ही भीतर स्थित और विमुक्त होता है। 

काया से स्पृष्टव्य पाकर लोभ नहीं करता है, प्रसन्न नहीं हो जाता है, राग पैदा नहीं करता है। उसका शरीर स्थित होता है, उसका चित्त अपने भीतर ही भीतर स्थित और विमुक्त होता है।
काया से अप्रिय स्पृष्टव्य पाकर खिन्न नहीं हो जाता - उदास, मन मारा हुआ नहीं हो जाता । उसका शरीर स्थित होता है, उसका मन अपने भीतर ही भीतर स्थित और विमुक्त होता है। 

मन से धर्मों को जानकर लोभ नहीं करता है, प्रसन्न नहीं हो जाता है, राग पैदा नहीं करता है। उसका शरीर स्थित होता है, उसका चित्त अपने भीतर ही भीतर स्थित और विमुक्त होता है।
मन से अप्रिय धर्मों को जानकर खिन्न नहीं हो जाता - उदास, मन मारा हुआ नहीं हो जाता । उसका शरीर स्थित होता है, उसका मन अपने भीतर ही भीतर स्थित और विमुक्त होता है। 

कुण्डलिय !  इस प्रकार इन्द्रिय-संवर भावित और अभ्यस्त होने से तीन सुचरित पूर्ण होते हैं।
 
 तीन सुचरित:

कुण्डलिय परिव्राजक-
हे गौतम!  किस प्रकार तीन सुचरित भावित और अभ्यस्त होने से चार स्मृतिप्रस्थान पूर्ण होते हैं? 

बुद्ध ने कहा -
कुण्डलिय ! भिक्खु काय-दुश्चरित्र को छोड़ काय-सुचरित्र का अभ्यास करता है। 
वाक-दुश्चरित्र को छोड़ वाक-सुचरित्र का अभ्यास करता है। 
मनो-दुश्चरित्र को छोड़ मनो-सुचरित्र का अभ्यास करता है।  

कुण्डलिय ! इस प्रकार तीन सुचरित भावित और अभ्यस्त होने से चार स्मृतिप्रस्थान पूर्ण होते हैं।

चार सतिपट्ठान:

कुण्डलिय परिव्राजक-
हे गौतम ! किस प्रकार चार स्मृतिप्रस्थान भावित और अभ्यस्त होने से सात बोध्यङ्ग पूर्ण होते हैं? 

बुद्ध ने कहा-
कुण्डलिय ! भिक्खु काया में कायानुपश्यी होकर विहार करता है ... ।
वेदना में वेदनानुपश्यी होकर विहार करता है ... ।
चित्त में चित्तानुपश्यी होकर विहार करता है ... ।
धर्मों में धर्मानुपश्यी होकर विहार करता है ... ।

कुण्डलिय ! इस प्रकार चार स्मृतिप्रस्थान भावित और अभ्यस्त होने से सात बोध्यङ्ग पूर्ण होते हैं।
   
सात-बोज्झंग:

कुण्डलिय परिव्राजक-
हे गौतम !  किस प्रकार सात बोध्यंग भावित और अभ्यस्त होने से विद्या और विमुक्ति पूर्ण होती हैं? 

बुद्ध ने कहा-
कुण्डलिय ! भिक्खु -
विवेक, विराग और निरोध की ओर ले जानेवाले स्मृति-संबोध्यंग का अभ्यास करता है, जिससे मुक्ति होती है। 

विवेक, विराग और निरोध की ओर ले जानेवाले धर्म-विचय-संबोध्यंग का अभ्यास करता है, जिससे मुक्ति होती है। 

विवेक, विराग और निरोध की ओर ले जानेवाले वीर्य-संबोध्यंग का अभ्यास करता है, जिससे मुक्ति होती है। 

विवेक, विराग और निरोध की ओर ले जानेवाले प्रीति-संबोध्यंग का अभ्यास करता है, जिससे मुक्ति होती है।

 विवेक, विराग और निरोध की ओर ले जानेवाले प्रश्रब्धि-संबोध्यंग का अभ्यास करता है, जिससे मुक्ति होती है। 

विवेक, विराग और निरोध की ओर ले जानेवाले समाधि-संबोध्यंग का अभ्यास करता है, जिससे मुक्ति होती है। 

विवेक, विराग और निरोध की ओर ले जानेवाले उपेक्षा-संबोध्यंग का अभ्यास करता है, जिससे मुक्ति होती है। 

कुण्डलिय ! इस प्रकार सात बोध्यंग भावित और अभ्यस्त होने से विद्या और विमुक्ति पूर्ण होती है। "

यह कहने पर, कुण्डलिय परिव्राजक भगवान से बोला -

 भन्ते ! आश्चर्य है, अद्भुत है !
जैसे औंधे को सीधा कर दे, 
ढँके को उखाड़ दे, भूले को रास्ता बतला दे, अंधकार में तेल का प्रदीप रख दे -- जिसमें कि आँख वाले रूप को देखें, 
ऐसे ही आप गौतम ने अनेक पलियाय (पर्याय) से धम्म को प्रकाशित किया | 
यह हम आप गौतम को शरण जाते हैं, धम्म और भिक्खु-संघ की भी। आज से आप गौतम मुझे जीवन-पर्यन्त,अंजलिबद्ध, 
शरणागत उपासक स्वीकार करें।"

नमो बुद्धाय🙏🙏🙏 
Ref:कुण्डलि सुत्त
20.12.2023

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