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बहुजन समाज पार्टी का कभी कोई मकसद था ही नहीं, भटकने की बात निरर्थक,,,


विजय बौद्ध संपादक दि बुद्धिस्ट टाइम्स भोपाल मध्य प्रदेश, राष्ट्रीय संयोजक, एकीकृत बहुजन रिपब्लिकन एक्शन कमेटी ऑफ इंडिया नई दिल्ली, 9424 756130,


 सामाजिक संस्था बहुजन भारत के अध्यक्ष पूर्व IAS कुंवर फतेह बहादुर ने एक आर्टिकल में लिखा है, कि बसपा नेतृत्व अपने मूल मकसद से भटक गया है। जिसके वजह से पार्टी के आदर्श से जुड़े इस समाज का भी भरोसा बसपा प्रमुख पर कम होता दिख रहा है। यूपी में हो रहे लोकसभा चुनाव में दलितों में चमार जाटव बिरादरी के सामने, संविधान बचाने की चुनौती है। इस वर्ग को यह बात अच्छी तरह से मालूम है। कि संविधान विरोधी ताकतों को यूपी में ही रोकने पर संविधान को बचाया जा सकता है। उनका कहना है, कि भाजपा और आरएसएस शुरू से ही संविधान विरोधी रही है। और वे देश में मनुस्मृति के कानून को लागू करके देश में गैर बराबरी समाज वाली व्यवस्था लागू करने की पक्षधर रही है। मेरा मानना है कि जब बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम और मायावती को यह ज्ञान था। कि आरएसएस संघ संविधान विरोधी है। और वह देश में मनु स्मृति के कानून को लागू करके देश में गैर बराबरी समाजवादी व्यवस्था लागू करने के पक्षधर रहे हैं। तो मेरा मानना है। कि ऐसे संविधान विरोधी मनुस्मृति को मानने वाले आरएसएस संघ भाजपा से कांशीराम मायावती ने राजनीतिक समझौते कर सत्ता हासिल करना अपना एकमात्र लक्ष्य मकसद क्यों बनाया था ॽ गैर बराबरी समाजवादी व्यवस्था वर्ण व्यवस्था पर आधारित मनुस्मृति को डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर ने 25 दिसंबर 1927 को सार्वजनिक रूप से जलाया था। उसी दिन से आरएसएस संघ, डॉ अंबेडकर को अपना कट्टर दुश्मन मानते थे। क्योंकि मनुस्मृति ब्राह्मणों का एक पवित्र ग्रंथ उनका अपना एक संविधान था। जिसे डॉक्टर अंबेडकर ने जला दिया था। यह घटना गुलाम भारत में घटी थी। और जब भारत 1947 में आजाद हुआ तो आजाद भारत का संविधान निर्माण किए जाने की जिम्मेदारी मनु स्मृति जलाने वाले डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर को ही दी गई थी। डॉक्टर डॉक्टर ने भारत का संविधान लिखकर संविधान के आर्टिकल 13 में मनुस्मृति सहित सभी स्मृतियों के अस्तित्व को ही खत्म कर दिया था। और जब 26 नवंबर 1949 में संविधान बनकर तैयार हुआ था।
 तो डॉक्टर अंबेडकर द्वारा निर्मित भारतीय संविधान लागू नहीं होना चाहिए, करके,, रामराज्य परिषद, हिंदू महासभा आरएसएस संघ ने कड़ा विरोध किया था। और दिल्ली में 11 दिसंबर 1949 को धरना प्रदर्शन किए थे। धरना प्रदर्शन ही नहीं बल्कि समूचे देश में डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर के आरएसएस संघ ने पुतले जलाए थे। और कहां गया था। कि मनुस्मृति के रहते हुए किसी संविधान की क्या जरूरत है ॽ 30 नवंबर 1949 को संविधान का अंतिम मसौदा डॉ अंबेडकर ने संविधान सभा को सौंपा था। उस दिन आरएसएस के मुख्य पत्र ऑर्गेनाइजर में आरएसएस प्रमुख सदाशिव गोवलकर ने संविधान पर एक आर्टिकल लिखा था। और कहा था। कि भारत के नए संविधान में वैदिक संस्कृति का एक अंश भी नहीं है। नया संविधान, प्राचीन भारतीय वैदिक सभ्यता संवैधानिक कानून संस्थाओं  शब्दावली और मुहावरों का कोई उल्लेख नहीं है। उन्होंने भारतीय संविधान को जहरीला बीज कहा था। गैर बराबरी वाला काला कानून मनुस्मृति को जलाकर डॉक्टर अंबेडकर ने भारतीय संविधान निर्मान किया था। उस संविधान का विरोध करने वाले संघ भाजपा से तथाकथित बहुजन नायक कांशीराम मायावती ने उत्तर प्रदेश में हमेशा राजनीतिक समझौते कर सिर्फ सत्ता हासिल करना अपना मात्र मकसद क्यों बनाया था ॽ यदि कांशीराम मायावती बहुजन समाज पार्टी का कोई मकसद होता तो वह डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर एवं बहुजन महापुरुषों के विचारधारा को आत्मसात करते, जिन्होंने जीवन भर ब्राह्मणवाद मनुवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ा, संघर्ष किया था। जिन बहुजन महापुरुषों ने विशेषतः डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर ने जिस ब्राह्मणवाद मनुवाद के खिलाफ संघर्ष कर सामाजिक न्याय स्थापित किया था। देश का संविधान बनाकर अछूत वंचित शोषित पीड़ित समाज को ऊंचा उठाने उन्हें संवैधानिक और मौलिक अधिकार दिया था। उस संविधान विरोधी फासीवादी ताकतों से, बहुजन समाज पार्टी कांशीराम मायावती को राजनीतिक समझौते करने की क्यों जरूरत पड़ी थी ॽ गुजरात गोधरा कांड सांप्रदायिक दंगों के आरोपी आरएसएस  संघ भाजपा के नरेंद्र मोदी को खुला समर्थन किए जाने की मायावती को क्यों जरूरत पड़ी थीॽ आरएसएस संघ के भैरवसिंह शेखावत को उपराष्ट्रपति पद के लिए समर्थन दिए जाने की मायावती को क्या जरूरत पड़ गई थी ॽ इससे स्पष्ट होता है, कि बहुजन समाज पार्टी कांशीराम मायावती का कोई मकसद नहीं था। सत्ता पाने के लिए वे मनुवादी ब्राह्मणों, संविधान विरोधियों से समझौता कर सकते थे, वह उन्होंने किया। वर्तमान जो देश का संविधान लोकतंत्र खतरे में है। बहुजन समाज खतरे में है। इसके लिए बहुजन समाज पार्टी और मायावती कांशीराम के अंधभक्त  जिम्मेदार है। कांशीराम ने भी अपने जीते जी ब्राह्मणवाद को मजबूत किया और कांशीराम के मरने के बाद मायावती ने, उत्तर प्रदेश के सीतापुर निवासी अधिवक्ता रंजीत पुष्कर ने एक आर्टिकल लिखा है। जो मार्च माह 2024 में मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से प्रकाशित दि बुद्धिस्ट टाइम्स राष्ट्रीय मासिक पत्रिका में प्रकाशित भी हुआ है‌। उसमें उन्होंने कांशीराम को बहुजन नायक नहीं, जातिवादी ब्राह्मणवाद के पोषक बताया है। और यह भी कहा है, कि कांशीराम, डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर के मूवमेंट के सबसे बड़े विरोधी, समाज के गद्दार थे। उन्हें बहुजन नायक की बजाय बहुजन खलनायक की संज्ञा दी जाना चाहिए। बहुजन चिंतक महाराष्ट्र के संजय रंगारी ने भी कहा है। कि कांशीराम ब्राह्मणवाद के पोषक थे। उन्होंने कहा कांशीराम की उपस्थिति में 2002 में बहुजन समाज पार्टी में ब्राह्मण सतीश मिश्रा को शामिल किया गया था। 1986 में टोपाज कंपनी के मालिक जयंत मल्होत्रा स्वर्ण को कांशीराम ने ही पार्टी में शामिल किया, और उन्हें राज्यसभा में चुनकर भेजा था। कांशीराम ने हमेशा ब्राह्मण मनुवादी भाजपा के साथ समझौते कर उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की सरकार बनाई। बहुजन समाज पार्टी की सरकार गिर जाने के बाद सन् 1995 में ब्राह्मण रामवीर उपाध्याय और सीमा उपाध्याय इन दोनों ब्राह्मण को पार्टी में कांशीराम ने शामिल किया और उन्हें हाथरस से पार्टी का उम्मीदवार बनाया और लोकसभा चुनाव में जीत कर संसद में पहुंचाया था। उसके तुरंत बाद बृजेश पाठक ब्राह्मण को पार्टी में कांशीराम की उपस्थिति में ही शामिल किया गया। 2002 कांशीराम ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 36 टिकट ब्राह्मणों को और 10% टिकट वैश्यो को और 15 प्रतिशत क्षत्रियों को देखकर सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय का नारा बुलंद किया था। यही कारण था। कि कांशीराम हिंदू पैदा हुए और हिंदू रहकर ही मर गए, कभी बौद्ध नहीं बन पाए। कांशीराम के अवसरवादी जातिवादी सिद्धांत पर ही मायावती चल रही है। वह भी हिंदू पैदा हुई है। और हिंदू रहकर ही मर जाएगी, परंतु कभी बौद्ध धम्म नहीं अपनाएगी। इसका सीधा मतलब है। बहुजन समाज पार्टी का कोई मकसद, कोई विचारधारा नहीं थी। और नहीं है। सत्ता पाना और अकूत दौलत हासिल करना एक मात्र उद्देश्य था। दिल्ली जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रहे डॉक्टर तुलसीराम और इलाहाबाद हाईकोर्ट में अधिवक्ता रहे एस एस सागर से चर्चा के दौरान उन्होंने कहा था। बहुजन समाज पार्टी वालों की समझ माओवादियों की तरह है। जो अक्सर कहते हैं की जनता जितनी ज्यादा भुखमरी में रहेगी उतनी ही ज्यादा क्रांति को सफल बनाएगी। बसपा की,,,,,,,,,,,,, दलित सत्ता
 की अवधारणा माओवादियों का भिन्न संदर्भ दूसरा रूप है। बसपा की सोच ने  डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर की विचारधारा को सिर के बल खड़ा कर दिया है। दुश्मन से दोस्ती की उम्मीद जो रखता है। उससे बड़ा बेवकूफ दुनिया में कोई दूसरा नहीं हो सकता है। दलितों का दुश्मन वही द्विज ब्राह्मण तबका है। जिसे मायावती ने दोस्त बनाकर सिर पर बैठाया है। जो स्वर्ण ब्राह्मण उत्तर प्रदेश में जमीन के अंदर चला गया था। 20 वर्षों से सत्ता से बाहर था। उन्हें मायावती नेअपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए कब्र से बाहर निकाला है। और उनके आदेश पर दलितों पर ही बुलडोजर चला दिया है। अब मायावती मनुवादियों की दास बन गई है। डॉक्टर प्रोफेसर तुलसीराम ने एक आर्टिकल अपने जीवित कल में लिखा था। जो राष्ट्रीय सहारा अखबार में संपादकीय प्रकाशित हुई थी। उसके कुछ अंश मैं लिख रहा हूं। सत्ता पाने के लिए मायावती ने जिन मनुवादी ब्राह्मणों से हाथ मिलाया था। सत्ता खोने के बाद मायावती ने भाजपा को सांप्रदायिक तथा दलितों की सबसे बड़ी दुश्मन पार्टी बता कर उसके विरुद्ध राष्ट्रव्यापी जंग छेड़ने की घोषणा की थी। जिसके लिए मायावती ने धर्मनिरपेक्ष ताकतों से हाथ मिलाने का भी दावा किया था। उनका यह दावा किसी भी उस व्यक्ति के लिए स्वागत योग्य हो सकता था। जो धर्म को राजनीति से अलग रखना चाहता है। किंतु इस संदर्भ में मायावती की भूमिका अब तक अत्यंत संदिग्ध रही है। जिससे धर्मनिरपेक्षता के जन्मजातशत्रु संघ परिवार भाजपायों को भारतीय संविधान की धज्जियां उड़ाकर धर्म की राजनीति को आक्रामक बनाने का अमूल्य अवसर  मिला है। एक समय ऐसा था, जब कांशीराम, भाजपा को कोबरा सांप कहा करता थे। वही कोबरा सांप ने काल्पनिक मिथ्यो के आधार पर जानबूझकर डॉ आंबेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बावरी मस्जिद को ध्वस्त कर धर्मनिरपेक्षता को तार तार किया था। जिसकी धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने उक्त कृत्य का  सामाजिक राजनीतिक  बहिष्कार किया था। वहीं कुछ अरसे से बाद ही कांशीराम मायावती ने दलित सत्ता के नाम पर अपने गले में इस कोबरा सांप ,ब्राह्मणवाद मनुवाद की माला पहन लिया था। जिसके कारण देश की बागडोर सत्ता भाजपा संघ ब्राह्मणवाद के हाथों चली गई। इससे स्पष्ट हो जाता है, कि बहुजन समाज पार्टी कांशीराम का कोई मकसद नहीं था। सिर्फ सत्ता हथियाना और भ्रष्टाचार कर समाज से लूट खसोटकर अकूत दौलत प्राप्त करना एक मात्र मकसद था। जो पूरा हुआ। इसमें समाज को कुछ हासिल नहीं हुआ। समाज आज भी हासिए पर स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। जिस संविधान से समाज को संवैधानिक, मौलिक अधिकार मिले थे। वह संविधान हीअब खतरे में आ गया है। इसके लिए कांशीराम मायावती बहुजन समाज पार्टी जिम्मेदार है। और विशेष कर कांशीराम मायावती के अंधभक्त ॽ मनुवादी डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा निर्मित भारतीय संविधान बदलकर गैर बराबरी जात-पात उच्च नीच भेदभाव वर्ण व्यवस्था पर आधारित मनु स्मृति का काला कानून लागू किए जाने कटिबद्ध संकल्पित और उतावले है। इन मनुवादी फासीवादी ताकतों को रोकने के लिए धर्मनिरपेक्ष 16 राजनीतिक दलों ने जो संविधान लोकतंत्र पर आस्था रखते हैं। उन्होंने इंडिया गठबंधन बनाकर पूरी ताकत के साथ फासीवादियों को रोकने लोकसभा चुनाव की जंग में उतरे हुए हैं। वही स्वयं को बहुजन महापुरुषों की विचारधारा की पोषक एवं संविधान की हित चिंतक बताने वाली मायावती बहुजन समाज पार्टी,  ब्राह्मणवाद के चक्रव्यूह में फंसकर उनके दबाव में अकेले चुनाव मैदान में उतरकर फासीवादी ताकतों की जड़े मजबूत करने का पाप कर रही है। वही अंबेडकरवादी होने का दम भरने वाली डॉक्टर प्रोफेसर रितु सिंह और शंभू नाथ, संविधान विरोधी मनुवाद के समर्थक बहुजन समाज पार्टी से लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे कांशीराम मायावती के अंध भक्तों के कारण डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर का मिशन आंदोलन उनका कारवां आगे बढ़ने के बजाय पीछे चला गया है। यही कारण है। कि आज अंबेडकरवाद को खत्म कर मनुवाद पनप रहा है। और मनुवादी, बहुजनों पर राज कर रहे हैं। और उन्हें हमेशा अपना गुलाम बनाए रखने की साजिश रचे हुए हैं। इसी उद्देश्य को लेकर वे संविधान बदलने आमादा है। संविधान बदलने की साजिश रचने वाले मनुवादी भाजपा के खिलाफ 16 राजनीतिक दल एक इंडिया गठबंधन बनाकर लड़ रहे हैं। वही स्वयंभू अंबेडकरवादी संविधान की हित चिंतक बताने वाली मायावती, संविधान बचाने की लड़ाई लड़ने वाले इंडिया गठबंधन में शामिल न होकर अकेले चुनाव मैदान में उतरकर संविधान विरोधी ताकतों को मजबूत कर रही है। पूर्व IAS कुंवर फतेह बहादुर ने फिर कहा है, कि जाति जनगणना कराने और संविधान बचाने के लिए अपनी आवाज बुलंद किए जाने की उम्मीद बसपा मायावती से करना बेमानी होगी। क्योंकि एट्रोसिटी एक्ट को खत्म किए जाने के विरोध में जब 2 अप्रैल 2018 को देशभर में ऐतिहासिक आंदोलन हुए थे। उस आंदोलन में बसपा शरीक नहीं थी। इतना ही नहीं इसी बीच देश में उत्तर प्रदेश में कई दलित उत्पीड़न बलात्कार दलित महिलाओं की हत्याओं के सैकड़ो घटनाएं घटित हुई। लेकिन बसपा मायावती ने इन दलित अत्याचारों के खिलाफ कोई आंदोलन नहीं किया। हाथरस में दलित युवती के साथ सामूहिक बलात्कार और फिर नृशंस हत्या की गई। मायावती ने कोई आवाज नहीं उठाई। मायावती की पहली दलित सत्ता का जब मुश्किल से एक महा बीता था। कि ठीक उसी समय जुलाई 1997 में आरएसएस संघ परिवार के कार्यकर्ताओं ने मुंबई के घाटकोपर में डॉक्टर अंबेडकर की मूर्ति को जूतों की माला पहनकर समूचे देश के दलित समाज को अपमानित किया गया था। और विरोध करने पर 10 दलितों को संघी सरकार ने गोलियों से भून दिया था। पूरे उत्तर भारत में सैकड़ो डॉ अंबेडकर की मूर्तियां तोड़ी गई। परंतु मायावती की दलित सत्ता से भाजपा को क्लीन चिट मिलती गई। उत्तर प्रदेश में उक्त घटनाओं की बहुजन समाज पार्टी ने निंदा तक नहीं की, जबकि उत्तर भारत में अंबेडकरवादियों ने उग्र प्रतिक्रिया जाहिर की थी। गोधरा गुजरात कांड में जनसंहारों मुसलमानों दलितों की हत्या मुस्लिम महिलाओं के साथ बलात्कार किए जाने के बाद मायावती ने संघ भाजपा के नरेंद्र मोदी को दोबारा सत्ता में लाने के लिए भाजपा नरेंद्र मोदी का जमकर चुनाव प्रचार किया था। झांझर में जब संघ परिवार ने गौ हत्या का मिथक गढकर पांच दलितों को जिंदा जला दिया। तो मायावती ने दलितों को जिंदा जलाने वालों को क्लीन चिट दे दिया था। इसके पहले लाल कृष्ण आडवाणी मुरली मनोहर जोशी उमा भारती समेत कई संघी नेताओं ने अयोध्या में मस्जिद गिराई थी। मायावती ने धर्मनिरपेक्षता को लात मार कर सुप्रीम कोर्ट के द्वारा दिए गए कानूनी अधिकार की धज्जियां उड़ाते हुए उन्हें साफ-साफ बचा लिया। और उन्हें कोर्ट में अपील करने की जरूरत भी नहीं पड़ी। इस घटना के दो सप्ताह बाद सितंबर 2002 में लखनऊ के डॉक्टर अंबेडकर पार्क में लाखों दलितों की विशाल रैली सभा में आरएसएस के लाल कृष्णा आडवाणी को मायावती ने ,,,,दलित मुक्तिदाता सम्मान,,,, से सम्मानित किया था। डॉ अंबेडकर को अपमानित करने के उद्देश्य से the shipping falls God dr Ambedkar पुस्तक लिखने वाले अरुण शौरी को मायावती ने यह कहकर क्लीन चिट दे दी कि वह उनके व्यक्तिगत विचार थे। जिसके कारण संघ भाजपा ने अरुण शौरी को राज्यसभा में भेज कर केंद्रीय मंत्री बनाया था। दलित अत्याचार विरोधी एक्ट को एक सरकारी अध्यादेश लाकर मायावती ने समाप्त कर दिया था। और आदेश जारी कर दिया कि दलित हत्या और बलात्कार के मामले में ही सिर्फ इस एक्ट में चलेंगे। इस एक्ट को खत्म किए जाने से उत्तर प्रदेश में दलित उत्पीड़न बढ़ता गया। परंतु पुलिस थानों में एफआईआर दर्ज तक नहीं होती थी। मायावती ने दलित सत्ता के आवरण में भाजपा संघ ब्राह्मणों को खुश करने के लिए यह अंजाम दिया था। डॉक्टर अलख निरंजन ने वर्तमान स्थिति में लोकसभा चुनाव को दृष्टिगत रखते हुए अपने शीर्षक में लिखा है। ,,,,खात्मे  के रास्ते पर मायावती की राजनीति,,,, उन्होंने कहा है। कि लोकसभा सामान्य निर्वाचन 2024 की प्रक्रिया प्रारंभ होने के 1 वर्ष पूर्व ही हिंदुत्व की राजनीति के वैचारिक एवं राजनीतिक विरोधियों ने राजनीतिक ध्रुवीकरण प्रारंभ कर दिया था। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी राष्ट्रीय लोक दल तृणमूल कांग्रेस डीएमके आम आदमी पार्टी शिवसेना जैसे कई दलों ने मिलकर बीजेपी को केंद्र की सत्ता से बाहर करने के लिए इंडिया गठबंधन बनाए। परंतु हिंदू राज को रोकने संविधान लोकतंत्र को बचाने वाले इंडिया गठबंधन में मायावती बहुजन समाज पार्टी शामिल न होकर हिंदुत्व को मजबूत कर रही है। जबकि डॉक्टर अंबेडकर ने कहा था। यदि हिंदू राज हकीकत में बनता है। तो इस देश के लिए विध्वंसकारी होगा। मायावती, बसपा को, डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर के विचारों पर चलने वाली पार्टी कहती है। लेकिन पिछले 10 सालों से यह देश, भाजपा की विध्वंसकारी शासन के नीचे कराह रहा है। इन परिस्थितियों में तथा कथित बाबा साहब अंबेडकर के विचारों पर चलने वाली मायावती को भाजपा को सत्ता से हटाने के लिए अग्रणी भूमिका निभाना चाहिए थी। लेकिन मायावती ने ऐसा नहीं किया। मायावती का भाजपा विरोधी राजनीतिक संगठन का हिस्सा न बनाना राजनीतिक टिप्पणीकारो के लिए एक पहेली बना हुआ है। जिसे सुलझाना मुश्किल हो गया है। लेकिन मैं इसे सुलझाना अत्यंत सरल समझता हूं। यदि डॉक्टर अलख निरंजन मेरे पूरे आर्टिकल को पढ़ ले तो वह भी आसानी से समझ जाएंगे। कांशीराम और मायावती बहुजन समाज पार्टी का कोई मकसद नहीं था। उनका कोई उद्देश्य नहीं था। उनका उद्देश्य, मात्र दलित सत्ता की अवधारणा एवं भ्रष्टाचार ,समाज को लूट खसोटकर अकूत दौलत प्राप्त करना था। और उनके लिए मनुवादी ब्राह्मण आरएसएस संघ भाजपा से राजनीतिक समझौते करना पड़े तो करना था। वहीं उन्होंने किया। और अब भाजपा ब्राह्मणवाद के चक्रव्यूह में फंसीं मायावती, अपने परिवार एवं स्वयं को बचाने जेल जाने के डर से, संविधान लोकतंत्र बचाने की लड़ाई लड़ने वाले इंडिया गठबंधन में शामिल नहीं हुई है। और अकेले चुनाव लड़कर, अंबेडकरवाद को खोखला कर, मनुवाद की जड़े मजबूत कर रही है। इन्हीं आधार पर मैंने लिखा है, कि बहुजन समाज पार्टी, कांशीराम मायावती का कोई मकसद, कोई उद्देश्य नहीं था। जब कोई मकसद ही नहीं था, तो मकसद से भटकने का कोई औचित्य नहीं है। देश के जागरूक नागरिक एवं बुद्धिजीवी अंबेडकर वादियों से अपील है। कि वह बहुजन समाज पार्टी मायावती के झांसे में न आकर, इंडिया गठबंधन के प्रत्याशी को अपना वोट देकर बहुमत से विजयी बनाएं। और डॉक्टर अंबेडकर द्वारा निर्मित भारतीय संविधान लोकतंत्र और अपने बहुजन समाज को बचाएं,,, जय भीम,,

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