[प्रतीत्यसमुत्पाद की व्याख्या]
(Analysis of Dependent Origination)
एक समय भगवान बुद्ध श्रावस्ती में विहार करते थे। उस समय भिक्षुओ को सम्बोधित करते हुए भगवान ने कहा-
भिक्षुओ ! प्रतीत्यसमुत्पाद का विभाग करके उपदेश करूंगा,
उसे सुनो।
अच्छी तरह मन में धारण करो ; मैं कहता हूँ।
“भन्ते ! बहुत अच्छा'' कह, भिक्षुओं ने भगवान को उत्तर दिया।
भगवान-भिक्षुओ ! प्रतीत्यसमुत्पाद क्या है ?
भिक्षुओ ! अविद्या के होने से संस्कार होते हैं। संस्कारों के होने से विज्ञान होता है। विज्ञान के होने से नामरूप होते हैं। नामरूप के होने से षड़ायतन होता है। षड़ायतन के होने से स्पर्श होता है। स्पर्श के होने से वेदना होती है। वेदना के होने से तृष्णा होती है। तृष्णा के होने से उपादान होता है। उपादान के होने से भव होता है । भव के होने से जाति होती है। जाति के होने से जरा, मरण, शोक, रोना-पीटना, दुःख, बेचैनी और परेशानी होती है। इस तरह, सारे दुःख-समूह का समुदय होता है। भिक्षुओ ! इसी को प्रतीत्य समुत्पाद कहते हैं।
उस अविद्या के बिल्कुल हट और रुक जाने से संस्कार होने नहीं पाते । संस्कारों के रुक जाने से विज्ञान होने नहीं पाता। विज्ञान के रुक जाने से नामरूप होने नहीं पाते। नामरूप के रुक जाने से षड़ायतन होने नहीं पाता। षडायतन के रुक जाने से स्पर्श होने नहीं पाता। स्पर्श के रुक जाने से वेदना नहीं होती। वेदना के रुक जाने से तृष्णा होने नहीं पाती। तृष्णा के रुक जाने से उपादान होने नहीं पाता। उपादान के रुक जाने से भव होने नहीं पाता। भव के रुक जाने से जाति होने नहीं पाती। जाति के रुक जाने से न जरा, न मरण, न शोक, न रोना-पीटना, न दुःख, न बेचैनी और न तो परेशानी होती है। इस तरह, यह सारा दुःख-समूह रुक जाता है ।
भिक्षुओ ! और, जरा-मरण क्या है ? जो उन-उन जीवों के उन-उन योनियों में पूरा हो जाना, पुरनिया हो जाना, दाँतों का टूट जाना, बाल सफेद हो जाना, झुर्रियों पर जानी, आयु का अंत, और इन्द्रियों का शिथिल हो जाना है। इसी को कहते हैं 'जरा' ।
जो उन-उन जीवों के उन-उन योनियों से खिसक पडना, कट जाना, अन्तर्धान हो जाना, मृत्यु, मरण, स्कन्धों का छिन्न-भिन्न हो जाना, शरीर छोड़ देना है। इसी को कहते हैं 'मरण' । ऐसी वह है जरा, और ऐसा यह है मरण । भिक्षुओं ! इसी को जरा-मरण कहते हैं।
भिक्षुओ ! जाति क्या है ? जो उन-उन जीवों के उन-उन योनियों में जन्म लेना, पैदा हो जाना, चला आना, कर प्रगट हो जाना, 'स्कन्धों का प्रादुर्भाव, आयतनों का प्रतिलाभ करना है; भिक्षुओ ! इसी को कहते हैं जाती |
भिक्षु ! भव क्या हैं ?
भिक्षु ! भव तीन प्रकार के होते हैं ।
(1) काम-भव (काम-लोक में बना रहना),
(2) रूप-भव (रूप-लोक में बना रहना ) और
(3) अरूप-भव ( अरूप-लोक में बना रहना )। भिक्षुओं ! इसी को कहते हैं ‘भव' ।
भिक्षुओं ! उपादान क्या है ? उपादान चार प्रकार के हैं।
(1) काम-उपादान,
(2) (मिथ्या) दृष्टि-उपादान,
(3) शीलवत-उपादान और
(4) आत्मवाद-उपादान । भिक्षु ! इसी को कहते ‘उपादान" ।
भिक्षु ! तृष्णा क्या है ? भिक्षुओं! तृष्णा छः प्रकार की हैं।
(1) रूप-तृष्णा,
(2) शब्द-तृष्णा,
(3) गन्ध-तृष्णा,
(4) रस-शुष्णा,
(5) स्पर्श-तृष्णा, और
(6) धर्म-तृष्णा । भिक्षु है ! इसी को कहते हैं “तृष्णा ' ।
भिक्षु ! वेदना क्या है ? भिक्षुओ! वेदना छः प्रकार की हैं।
(1) चक्षु के संस्पर्श से होनेवाली वेदना,
(2) श्रोत्र के संस्पर्श से होनेवाली वेदना,
(3) घ्राण के संस्पर्श से होनेवाली वेदना,
(4) जिह्वा के संस्पर्श से होनेवाली वेदना,
(5) काया के संस्पर्श से होनेवाली वेदना, और
(6) मन के संस्पर्श से होने वाली वेदना । भिक्षुओं ! इसी को कहते हैं "वेदना' ।
भिक्षु ! स्पर्श क्या है ? भिक्षुओ ! स्पर्श छः प्रकार के हैं।
(1) चक्षु-संस्पर्श,
(2) श्रोतसंस्पर्श,
(3) घ्राण-संस्पर्श,
(4) जिह्वा-संस्पर्श,
(5) काया-संस्पर्श, और
(6) मन-संस्पर्श । भिक्षु ! इसी को कहते हैं “स्पर्श' ।
भिक्षु ! आयतन क्या है ?
(1) चक्षु-आयतन,
(2) श्रोत-आयतन,
(3) घ्राण-आयतन,
(4) जिह्वा-आयतन,
(5) काया-आयतन, और
(6) मन-आयतन । भिक्षुओं ! इन्हीं को कहते है आयतन.
भिक्षु ! नामरूप क्या है ?
विज्ञान, संज्ञा, वेदना, संस्कार, इसे 'नाम' (चित) कहते हैं । चार महाभूतों को लेकर जो रूप होते हैं, इसे 'रूप' कहते हैं। इस तरह यह नाम हुआ, और यह रुप हुआ। भिक्षुओं ! इसी को कहते हैं नामरूप ।
भिक्षुओ ! विज्ञान क्या है ?
भिक्षु ! विज्ञान छः प्रकार के होते हैं।
(1) चक्षु-विज्ञान,
(2) श्रोत-विज्ञान,
(3) घ्राण-विज्ञान,
(4) जिह्वा-विज्ञान,
(5) काय-विज्ञान, और
(6) मनोविज्ञान ।
भिक्षुओ! इसी को कहते हैं "विज्ञान''।
भिक्षु ! संस्कार क्या है ?
भिक्षुओ ! संस्कार तीन प्रकार के हैं।
(1) काय-संस्कार,
(2) वाक्संस्कार,
(3) चित्त-संस्कार ।
भिक्षु ! इसी को कहते हैं 'संस्कार'।
भिक्षुओ ! अविद्या क्या है ?
भिक्षुओ ! जो दुःख को नहीं जानता है, जो दुःख-समुदय को नहीं जानता है, जो दुःख-निरोध को नहीं जानता है, और जो दुःख निरोध-गामिनी प्रतिपदा को नहीं जानता है। भिक्षुओ ! इसी को कहते हैं “अविद्या”।
भिक्षुओ ! इसी अविद्या के होने से संस्कार होते हैं। संस्कारों के होने से विज्ञान होता है। विज्ञान के होने से नामरूप होते हैं। नामरूप के होने से षड़ायतन होता है। षड़ायतन के होने से स्पर्श होता है। स्पर्श के होने से वेदना होती है। वेदना के होने से तृष्णा होती है। तृष्णा के होने से उपादान होता है। उपादान के होने से भव होता है । भव के होने से जाति होती है। जाति के होने से जरा, मरण, शोक, रोना-पीटना, दुःख, बेचैनी और परेशानी होती है। इस तरह, सारे दुःख-समूह का समुदय होता है।
उस अविद्या के बिल्कुल हट और रुक जाने से संस्कार होने नहीं पाते। संस्कारों के रुक जाने से विज्ञान होने नहीं पाता। विज्ञान के रुक जाने से नामरूप होने नहीं पाते। नामरूप के रुक जाने से षड़ायतन होने नहीं पाता। षडायतन के रुक जाने से स्पर्श होने नहीं पाता। स्पर्श के रुक जाने से वेदना नहीं होती। वेदना के रुक जाने से तृष्णा होने नहीं पाती। तृष्णा के रुक जाने से उपादान होने नहीं पाता। उपादान के रुक जाने से भव होने नहीं पाता। भव के रुक जाने से जाति होने नहीं पाती। जाति के रुक जाने से न जरा, न मरण, न शोक, न रोना-पीटना, न दुःख, न बेचैनी और न तो परेशानी होती है। इस तरह, यह सारा दुःख-समूह रुक जाता है।
नमो बुद्धाय🙏🙏🙏
Ref: विभङ्ग सुत्त:संयुक्तनिकाय
09.05.2024


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