🌻धम्म प्रभात🌻
एक समय भगवान शाक्य जनपद के कपिलवस्तु में न्यग्रोधाराम में विहार कर रहे थे। उस समय बहुत से शाक्य उपासक उपोसथ के दिन जहां भगवान थे, वहां पहुंचे। पास जाकर भगवान को नमस्कार कर एक ओर बैठे।
जिस समय शाक्य उपासक एक ओर बैठे हुए थे, भगवान ने उन सभी से यह पूछा-
"शाक्यो ! क्या तुम अष्टांग उपोसथ व्रत का पालन करते हो?"
उत्तर:
"भन्ते ! कभी हम अष्टांग उपोसथ व्रत रखते हैं, कभी नहीं भी रखते हैं।"
“ शाक्यो ! यह तुम्हारे लिए हानिकर है, यह हितकर नहीं है कि तुम इस प्रकार के शोक-भय से युक्त जीवन के रहते, मरण-भय से युक्त जीवन के रहते, कभी अष्टांग उपोसथ व्रत रखते हो, कभी अष्टांग उपोसथ व्रत नहीं भी रखते हो।
शाक्यों! क्या तुम यह मानते हो कि कोई आदमी जीविका के किसी न किसी साधन से, बिना अकुशल कर्म किए, दिन में आधा कार्षापण कमा सकता है?
यह कहना अनावश्यक है कि वह (ऐसी जीविका कमाने वाला व्यक्ति) आदमी होशियार होगा और मेहनती होगा?"
“भन्ते! हां।”
"शाक्यों! क्या तुम यह मानते हो कि कोई आदमी जीविका के किसी-न-किसी साधन से, बिना अकुशल कर्म किए, दिन में एक कार्षापण कमा सकता है?
यह कहना अनावश्यक है कि वह आदमी होशियार होगा, मेहनती होगा?"
“भन्ते ! हां।”
"शाक्यों! क्या तुम यह मानते हो कि कोई आदमी जीविका के किसी न किसी साधन से, बिना अकुशल कर्म किए, दिन में दो कार्षापण कमा सकता है?
यह कहना अनावश्यक है कि वह आदमी होशियार होगा, मेहनती होगा?"
“भन्ते ! हां।”
तीन कार्षापण कमा सकता है? ...
चार कार्षापण कमा सकता है? ...
पांच कार्षापण कमा सकता है? ...
छह कार्षापण कमा सकता है? ...
सात कार्षापण कमा सकता है? ...
आठ कार्षापण कमा सकता है? ...
नौ कार्षापण कमा सकता है? ...
दस कार्षापण कमा सकता है? ...
बीस कार्षापण कमा सकता है? ...
तीस कार्षापण कमा सकता है? ...
चालीस कार्षापण पचास कार्षापण कमा सकता है? ...
सौ कार्षापण कमा सकता है?
यह कहना अनावश्यक है कि वह आदमी होशियार होगा, मेहनती होगा ?”
"भन्ते ! हां।"
"शाक्यो! क्या तुम यह मानते हो कि वह आदमी दिन प्रतिदिन सौ-सौ कार्षापण कमाता हुआ, जो-जो कमाए उसे जमा करता हुआ, सौ वर्ष की आयु होने पर बहुत-सी धन-राशि एकत्र कर ले सकता है?"
"भन्ते। हां।"
"शाक्यों! क्या तुम यह मानते हो कि वह आदमी उस भोग (के साधनों) के रहते, उस भोग (के साधनों के हेतु से, उस भोग (के साधनों) के कारण एक रात भी, आधी रात भी एक दिन भी, आधे दिन भी, सर्वांश में सुखी रह सकता है?"
"भन्ते! नहीं।"
"ऐसा किसलिए?"
"भन्ते! काम-भोगों के जितने साधन हैं
-अनित्य हैं,
-तुच्छ हैं,
-मृषा हैं,
-व्यर्थ हैं।"
“शाक्यो! मेरा श्रावक यदि मेरे कहने के अनुसार दस वर्ष भी प्रमाद रहित हो, प्रयत्नशील हो, सतत जागरूक रहकर - आचरण करे तो वह सौ वर्ष भी, दस हजार वर्ष भी, लाख वर्ष भी सर्वांश में सुखी रह सकता है। वह निश्चय से सकृदागामी, अनागामी या स्रोतापन्न हो सकता है।
शाक्यो ! दस वर्ष की बात तो रहने दो, मेरा श्रावक यदि मेरे कहने के अनुसार -
नौ वर्ष...
आठ वर्ष...
सात वर्ष...
छह वर्ष...
पांच वर्ष...
चार वर्ष...
तीन वर्ष...
दो वर्ष...
एक वर्ष भी प्रमाद रहित हो, प्रयत्नशील हो, सतत जागरूक रहकर आचरण करे तो वह सौ वर्ष भी, दस हजार वर्ष भी, लाख वर्ष भी सर्वांश में सुखी रह सकता है। वह निश्चय से सकृदागामी, अनागामी वा स्रोतापन्न हो सकता है।
शाक्यो ! एक वर्ष की बात तो रहने दो मेरा श्रावक यदि मेरे कहने के अनुसार दस महीने भी प्रमाद रहित हो, प्रयत्नशील हो, सतत जागरूक रहकर - आचरण करे तो वह सौ वर्ष भी, दस हजार वर्ष भी, लाख वर्ष भी सर्वांश में सुखी रह सकता है। वह निश्चय से सकृदागामी, अनागामी या स्रोतापन्न हो सकता है।
शाक्यों ! दस महीने की बात तो रहने दो। मेरा श्रावक यदि मेरे कहने के अनुसार नौ महीने...
आठ महीने...
सात महीने...
छह महीने...
पांच महीने...
चार महीने...
तीन महीने...
दो महीने...
एक महीने...
आधे महीने भी प्रमाद रहित हो, प्रयत्नशील हो, सतत जागरूक रहकर आचरण करे तो वह सौ वर्ष भी, दस हजार वर्ष भी, लाख वर्ष भी सर्वांश में सुखी रह सकता है। वह निश्चित रूप से सकृदागामी, अनागामी या स्रोतापन्न हो सकता है।
शाक्यो ! आधे महीने की बात रहने दो। मेरा श्रावक यदि मेरे कहने के अनुसार दस रात-दिन भी प्रमाद रहित हो, प्रयत्नशील हो, सतत जागरूक रहकर आचरण करे तो वह सौ वर्ष भी, दस हजार वर्ष भी, लाख वर्ष भी सर्वांश में सुखी रह सकता है। वह निश्चित रूप से सकृदागामी, अनागामी या स्रोतापन्न हो सकता है।
शाक्यों ! दस रात दिन की बात रहने दो। मेरा श्रावक यदि मेरे कहने के अनुसार नौ रात-दिन...
आठ रात-दिन....
सात रात-दिन...
छह रात-दिन...
पांच रात-दिन....
चार रात-दिन...
तीन रात-दिन....
दो रात-दिन....
एक रात-दिन भी प्रमाद-रहित हो, प्रयत्नशील हो, सतत जागरूक रहकर आचरण करे तो वह सौ वर्ष भी, दस हजार वर्ष भी, लाख वर्ष भी सर्वांश में सुखी रह सकता है। वह निश्चित रूप से सकृदागामी, अनागामी वा स्रोतापन्न हो सकता है।
शाक्यो! यह तुम्हारे लिए हानिकर है, यह हितकर नहीं है कि तुम इस प्रकार के शोक-भय युक्त जीवन के रहते, मरण-भय से युक्त जीवन के रहते, कभी अष्टांग उपोसथ व्रत रखते हो, कभी अष्टांग उपोसथ-व्रत नहीं रखते हो।"
(सभी शाक्यगण एक स्वर में कह उठे )
“भन्ते !
आज से हम भविष्य में अष्टांग उपोसथ व्रत का नियम से पालन करेंगे।"
नमो बुद्धाय🙏🙏🙏
Ref: सक्क सुत्त:अंगुत्तर-निकाय
07.07.2024


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