[सत्था किर में अनुप्पत्तो ]
अहो ! मुझे शास्ता मिल गये -- महाराज पुष्करसाति
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गांधार नरेश पुष्करसाति मगध नरेश बिंबिसार का अनदेखा पत्रमित्र था । जब उसे बिंबिसार के एक पत्र द्वारा वह सूचना मिली कि संसार में बुद्ध उत्पन्न हुए हैं और भव -संसार से सर्वथा विमुक्त होने की साधना -विधि सिखाते हैं तो उसमें अपूर्व धम्म संवेग जागा । राज वैभव त्याग कर उसने परिव्राजक का बाना पहना और भगवान के दर्शनार्थ गांधार देश की राजधानी तक्षशिला से मगध की राजधानी राजगृह की ओर पैदल चल पडा ।इस लंबी यात्रा के बाद जब वह राजगृह पहुंचा तब शाम हो जाने के कारण नगर के दरवाजे बंद हो चुके थे ।अत: रात बिताने के लिए नगर के बहार एक कुम्हार की धर्मशाला में ठहरा ।
भगवान बुद्ध भी श्रावस्ती के जेतवन से चल कर उसी शाम राजगृह पहुंचे और रात बिताने के लिए उसी धर्मशाला में ठहरे ।
पुष्करसाति भगवान को नही पहचान पाया । रात के अंतिम पहर में भगवान ने उससे बातचीत की और विपश्यना की गंभीर धातु विभंग देशना दी । इसे सुनकर गांधार नरेश पुष्करसाति ने भगवान की बतायी विधि से साधना करते हुए अनागामी अवस्था प्राप्त की । तब उसने भगवान को पहचाना ।
अत्यंत श्रद्धाबहुल होकर भगवान को नमन करते हुए, उसने ये प्रीति वाक्य अभिव्यक्त किये --
सत्था किर मे अनुप्पत्तो ।👏
सुगतो किर मे अनुप्पत्तो ।👏
सम्मासम्बुदो किर मे अनुप्पत्तो ।👏
अहो ! मुझे शास्ता, सुगम, सम्यक सम्बुद्ध मिल गए ।
धन्य हैं पुष्करसाति राजा को जिसने तथागत से विपश्यना सिखकर निर्वाण प्राप्त किया ।
नमो बुद्धाय🙏🙏🙏
06.08.2024


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