[मैत्री भावना कैसे करें?]
मैत्री की भावना करने की इच्छा वाले प्रारम्भिक साधक को विघ्नों को दूर करके कर्मस्थान को ग्रहण कर भली भांति बिछाये हुए आसन पर सुखपूर्वक बैठ, प्रारम्भ से द्वेष में अवगुण और शान्ति में गुण का प्रत्यवेक्षण करना चाहिए।
अवगुण देखने से द्वेष से चित्त को अलग करने और गुण देखने से क्षमा में लगाने के लिए मैत्री भाव का आरम्भ करना चाहिए और आरम्भ करने वाले को प्रारम्भ से ही व्यक्ति के दोषों को जानना चाहिए- इन व्यक्तियों में मैत्री भावना पहले नहीं करनी चाहिए, इनमें नहीं भावना करनी चाहिए।
अप्रिय व्यक्ति,
अति प्रिय सहायक,
मध्यस्थ और वैरी व्यक्ति - इन चारों में पहले मैत्री भावना नहीं करनी चाहिए।
असमान लिङ्ग (स्त्री आदि विस्मय लिङ्ग) में, भाग करके नहीं भावना करनी चाहिए।
मरे हुए की भावना नहीं करनी चाहिए ही ।
किस कारण से अप्रिय आदि में पहले भावना नहीं करनी चाहिए?
अप्रिय को प्रिय के स्थान पर रखते हुए क्लान्त होता है। अत्यन्त प्रिय सहायक को मध्यस्थ के स्थान पर रखते हुए क्लान्त होता है। उसके थोडे से भी दु:ख के उत्पन्न होने पर रूलांई आने के समान हो जाता है। मध्यस्थ को गौरव और प्रिय के स्थान पर रखते हुए क्लान्त होता है। वैरी का अनुस्मरण करने वाले को क्रोध उत्पन्न होता है,इसलिए अप्रिय आदि में पहले भावना नहीं करनी चाहिए।
अ-समान लिङ्ग में उसी के प्रति भाग करके भावना करने वाले साधक को राग उत्पन्न होता है।
मरे हुए में भावना करते हुए न तो अर्पणा को प्राप्त होता है और न उपचार को।
सबसे पहले-
अहं सुखितो होमि, होमि निद्दुक्खो- (मैं सुखी हूं,मैं दु:ख रहित हूं) या अवेरो अव्यापज्झो अनीधो सुखी अत्तानं परिहरामि- ( मैं वेर रहित हूं, व्यापाद रहित हूं, उपद्रव रहित हूं, सुखपूर्वक अपना परिहरण कर रहा हूं) ऐसे बार-बार अपने में ही भावना करनी चाहिए।
अपने मन को हर प्रकार से जांच लेने के बाद अपना मन मैत्री करने योग्य है तो मैत्री करनी चाहिए।
अपने को बिना जांचे मैत्री करना कर्मकांड हो जाता है। ऐसा करना फायदेमंद नहीं होता है।
नमो बुद्धाय🙏🙏🙏
05.08.2024


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