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धम्म प्रभात

धम्म प्रभात 

[तीन रत्नों की शरण तीन बार क्यों,
 कब से ?]

एक समय भगवान नालंदा में पाविरिक-आम्रवन में विहार करते थे। उस समय निर्ग्रंथ नाटपुत्त ( महावीर स्वामी) निर्ग्रंथों की एक बड़ी परिषद के साथ उसी नगर में विहरते थे। 
एक दिन निर्ग्रंथ दीघतपस्वी भगवान के पास चला गया। वहां उसने बताया कि निर्ग्रंथ नाटपुत्त पाप कर्म करने के लिए,पाप कर्म की प्रवृत्ति के लिए कर्मों का विधान नही करते, केवल ' दंड' का विधान करते हैं, और काय-दंड, वचन-दंड, मन-दंड में से  'काय-दंड ' को महादोष युक्त बतलाते हैं। 
भगवान ने कहा -  तथागत दंड का नहीं,' कर्मो' का विधान करते हैं, और काय - कर्म, वचन-कर्म, मन-कर्म में से 'मन-कर्म' को महादोष युक्त बतलाते है। 

निर्ग्रंथ नाटपुत्त को तथागत के  "कर्मों" के विधान का पता चला। इस विधान को झूठ ठहराने के लिए विवाद हेतु निर्ग्रंथ शिष्य उपालि गृहपति ( विनयधर उपालि नहीं ) को तथागत के पास भेजा। परंतु तथागत की धम्म देशना से प्रभावित होकर उस गृहपति उपालि ने त्रिरत्न की शरण के लिए प्रार्थना की। 

उस पर भगवान ने उससे कहा -  "गृहपति !  सोच समझ कर करो। "
यह सुन कर उपालि अधिक प्रभावित हुआ। 

दूसरी बार उपालि भगवान की शरण के लिए प्रार्थना की।
भगवान फिर बोले - "  गृहपति !  लंबे समय से तुम्हारा कुल निर्ग्रंथों के लिए प्याऊ की तरह रहा है, उनके आने पर 'पिंड नहीं देना चाहिए' - यह मत समझना। " यह सुन कर उपालि और अधिक प्रभावित हुआ।

तीसरी बार बुद्ध, धम्म तथा संघ की शरण के लिए प्रार्थना की।

तब भगवान ने उपालि को तीन रत्नों की शरण में लिया।

बुद्ध, धम्म, संघ की शरण जाने के लिए तथागत ने उपालि को तीन बार- समझने, सोचने और निर्णय लेने के लिए समय दिया।
 
सोच-समझकर तीन रत्नों की शरण लेने की परंपरा बुद्धकालीन है। इस परंपरा आज भी वर्तमान में बौद्ध संस्कार में जूडी हुई हैं।  इसलिए, बुद्ध वंदना के समय तीन रत्नों की शरण तीन बार ली जाती हैं - 

बुद्धं सरणं गच्छामी ।
धम्मं सरणं गच्छामी। 
संघं सरणं गच्छामी। 
दुतियम्पि............
ततियम्पि............ 
सरणं गच्छामी ।

 🌿साधु  🌿साधु  🌿साधु  

तीन बार -  साधु , साधु , साधु ,  बोलने का प्रयोजन क्या  है?

जब बौध्द भिक्षु- भिक्षुणी, बौध्दाचार्य, कोई ज्ञानी उपासक/उपासिका धम्म वाणी बोलते हैं, सुनाते है तो उनके वचन की समाप्ति पर तीन बार साधु , साधु , साधु  बोला जाता है।  

पहली बार जो  ' साधु ' कहा उसका अर्थ-
✅जो मैंने सुना वह प्रिय है।

दूसरी बार जो ' साधु '  कहा उसका अर्थ-
✅जो मैंने सुना वह ग्रहण किया।

तीसरी बार जो  ' साधु ' कहा उसका अर्थ-
✅जो मैंने सुना वह प्रिय लगा और मैंने ग्रहण किया वह मैं दूसरों के कल्याण के लिए बताऊँगा।

दूसरी बात जब हम किसी कथन, वचन, मत या विचार से सहमत होते हैं तो भी तीन बार साधु , साधु , साधु बोलते हैं। 
साधु शब्द का मतलव बहुत अच्छा, लाभप्रद और सत्य वचन। हाँ कहकर स्वीकर करना आदि।

    साधु.साधु.. साधु...

नमो बुद्धाय 🙏🙏🙏
Ref: उपालि सुत्त: मज्झिम- निकाय
07.08.2024

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