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🌻धम्म प्रभात🌻


🌻धम्म प्रभात🌻

【"अप्पमाणो धम्मो" (अपरिमित धम्म) 】

बुद्ध का धम्म जो सत्य पर आधारित है।

बुद्ध ने जो कहा है वह विज्ञान की कसौटी पर आज खरा उतरता है। बुद्ध ने कुदरत के रहस्यों को खोज कर उन नियमों पर चलने के लिए मनुष्यों को उपदेश दिया है। 

बुद्ध का जन्म सिद्धार्थ गौतम के रूप में लुम्बनी वन में प्रकृति की गोद में शाल वृक्ष की छांव में इसा पूर्व ५६३ वैशाख पूर्णिमा के दिन हुआ।
सिद्धार्थ के पिता शुद्धोधन कपिलवस्तु के राजा थे। लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप कपिलवस्तु की शासन प्रणाली थी। राजा भी खेती का व्यवसाय करते थे। हल जोतने वाले किसानों के एक त्योहार के दिन सात साल की उम्र में सिद्धार्थ गौतम जामुन के पेड़ की छांव में ध्यान करते दिखाई देते हैं।
महाभिनिष्क्रमण के बाद सिद्धार्थ का पूरा जीवन वन वृक्ष के नीचे बिता। सिद्धार्थ ने ३५ साल की उम्र में उरुवेला में निरंजना नदी के किनारे एक पिपल के वृक्ष के नीचे सम्यक सम्बोधि प्राप्त की। वह वैशाख पूर्णिमा की रात थी। सम्यक सम्बोधि प्राप्त होने से सिद्धार्थ अब बुद्ध हो गए। ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध वहीं बोधिवृक्ष ( पिपल वृक्ष ) के आसपास ७ सप्ताह ध्यान में व्यतीत करते दिखाई देते हैं।

"अथ खो भगवा बोधिरूक्ख मूले सन्नाहं एक पल्लकेन निसीद्द, विमुक्ति सुख।"
प्रथम सप्ताह वज्रासन पर ध्यान में बुद्ध ने सम्बोधि सुख का अनुभव लिया।
अनिमेष लोचन से दुसरे सप्ताह बुद्ध बोधिवृक्ष को देखते हुए बुद्ध दिखाई देते है। तीसरा सप्ताह चंक्रमण करते हुए दिखाई देते हैं। चौथा सप्ताह रतनघर पर कुदरत के सानिध्य में प्रतित्यसमुत्पाद का अनुभव करते हुए व्यतीत किया।
पांचवां सप्ताह बुद्ध ने बरगद के पेड़ के नीचे बिताया।
जहां बुद्ध ने एक चरवाहा ब्राह्मण के प्रश्न के उत्तर में कहा- जन्म से कोई ब्राह्मण नही होता है, कर्म से ही ब्राह्मण होता है। 
छठवां सप्ताह मुंचलिंग नामक नागराजा ने 'मुंचलिंग'  के समिप बुद्ध को ध्यानस्त देख उनको मुशलधार वर्षा से रक्षण दिया। यहां बुद्ध ने 
छठवां सप्ताह बिताया क़ुदरत के सानिध्य में।
  
सातवां सप्ताह बुद्ध ने राजायतन वृक्ष के नीचे बिताया। जहां भल्लिक और तपस्सु भाइयो ने बुद्ध  को मधु पिंड का भोजन दिया। सम्यक संबोधि के बाद बुद्ध का यह प्रथम भोजन माना जाता है। भल्लिक और तपस्सु ने बुद्ध और धम्म की शरण ली। उसी समय संघ का निर्माण नही हुआ था। 

अषाढ़ पूर्णिमा के दिन सारनाथ में बुद्ध ने आम्रवृक्ष के पास बिताया था।  45 साल लोक कल्याण के लिए बुद्ध ने नगर-नगर, गांव - गांव चारिका करते हुए धम्म का उपदेश दिया, लेकिन आराम तो वृक्ष मूल किया ऐसा हम देखते है जैसे - राजगृह, वैशाली, श्रावस्ती, वाराणसी, कपिलवस्तु और बहुत से स्थान पर बुद्ध वृक्ष तले विहार करते दिखाई देते हैं।अम्बटिकावन, करण्डवन, अंधवन, शिसापावन, महावन वैशाली,वेळुवन, अम्बवन, नागवन,पिप्पलीवन,न्यग्रोधावन, जामुनवन,जीवकम्बवन आदि  ४२ वन में  बुद्ध विहार करते है उसका उल्लेख मिलता है।
८० वर्ष की आयु हुईं तब वैशाखी पूर्णिमा की रात्रि पूरी होने के समय तथागत ने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया। वो भी दो शालवृक्ष की छाया में।

ऐसे बुद्ध का जीवन कुदरत के सानिध्य में ही बिता।
सभी प्राणी कुदरत का ही अंश है। कोई कुदरत से अलग नहीं है। इसलिए, सभी प्राणियों को चाहिए कुदरत के बंधे-बंधाए नियमों पर चलना। 

"ये च धम्मा अतीता च,
ये च धम्मा अनागता,
पच्चुप्पन्ना च ये धम्मा।"

अर्थात-
यह धम्म भूतकाल में था, वर्तमान में है और भविष्य में भी रहेगा।

‌नमो बुद्धाय🙏🙏🙏
15.06.2023

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