🌻धम्म प्रभात🌻
[ भव - Becoming ]
(प्रतीत्य समुत्पाद की दसवीं कडी)
उपादान पच्चया भव।
उपादान के कारण (प्रत्यय) से भव।
आवागमन और उत्पत्ति ही कहलाता हैं।
उपादान इसका समुदय हैं।
आयुष्मान महाकोट्ठित ने धम्म सेनापति सारिपुत्त से पूछा - -
"भन्ते ! भव कितने हैं? "
" आवुस ! ये तीन भव (लोक) हैं - - -
काम भव
रुप भव
अ-रूप भव ।"
और दो प्रकार के भव हैं।
1) काम भव
2) उत्पत्ति भव।
लौकिक कुशल एवं अकुशल कर्म नामक 29 चेतना कर्म भव हैं।
'भवति एतस्मा 'ति भवो, कम्मेव भवो कम्मभवो' अर्थात, जिस कर्म से फल का उत्पाद होता हैं उसे भव कहते हैं। कर्म ही भव हैं, क्योंकि कर्म से ही फलोत्पाद होता हैं।
'भवति इति भवो'।
कारण कर्म से उत्पन्न 32 लौकिक विपाक एवं कर्मज रूपों को 'उपपत्ति भव कहते हैं। अनागत (भविष्य) में उत्पन्न होता हैं, वह' उपपत्ति' हैं। जो होता हैं वह भव हैं, जो उपपत्ति हैं वही भव हैं, अतः उसे 'उपपत्ति' भव कहते हैं। अर्थात इस प्रत्युत्पन्न भव में कृत कुशल, अकुशल कर्म से अनागत भव में उत्पन्न होनेवाले फलविपाक उपपत्ति भव कहलाते हैं।
संस्कार एवं कर्म भव दोनों लौकिक कुशल एवं अकुशल में सम्प्रयुक चेतना ही होती हैं। अतः उनमें क्या भेद हैं? इस प्रत्युत्पन्न भव में फल प्राप्त करने के लिए अतीत भव में उत्पन्न चेतना को संस्कार कहते हैं। अनागत भव में फल प्राप्त करने के लिए इस भव में उत्पन्न कर्म हैं। अतः चेतना में साम्य होने पर भव काल भेद से भेद होता हैं। काय कम्म, वाचा कम्म और मनो कर्म, ये तीनों मिलकर ही कम्म भव हैं।
भवपच्चया जाति - भव के कारण ही जन्म होता हैं।
नमो बुद्धाय 🙏🙏🙏
07.06.2023


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