["भन्ते ! हम लोग जो चित्त प्रवृत्तियों में विचरने वाले हैं, किस चित्त-प्रवृत्ति में विचरण करें ? " - महानाम]
एक समय भगवान शाक्य जनपद के कपिलवस्तु नगर के निग्रोधाराम में विहार करते थे। उस समय बहुत से भिक्षु भगवान के लिए चीवर तैयार कर रहे थे। “चीवर का बनना समाप्त हो जाने पर और ( वर्षावास के ) तीन महीने पूरे हो जानेपर भगवान चारिका के लिए चल देंगे।" महानाम शाक्य ने यह सुना। तब महानाम शाक्य जहाँ भगवान थे, वहाँ गया। पास जाकर भगवान को नमस्कार कर एक ओर बैठा। एक ओर बैठे महानाम शाक्यने भगवान को यह कहा-
भन्ते ! मैंने सुना है कि बहुत से भिक्षु आपके लिए चीवर तैयार कर रहे हैं। चीवर तैयार हो जाने पर और तीन महीने पूरे हो जानेपर भगवान चारिका के लिए चल देंगे।' भन्ते ! हम लोग जो चित्त प्रवृत्तियों में विचरने वाले हैं, किस चित्त-प्रवृत्ति में विचरण करें ? "
भगवान ने कहा-
महानाम ! बहुत अच्छा, बहुत अच्छा। महानाम ! तुम्हारे जैसे कुलपुत्रों के लिए यही योग्य है कि तुम तथागत के पास आओ, और उनसे पूछो। भन्ते ! हम लोग नाना चित्त प्रवृतियों में विचरनेवाले हैं, किस प्रकार चित्त प्रवृतियों में विचरण करें ?
महानाम ! जो श्रद्धावान होता है वह (उद्देश्य की) पूर्ति करनेवाला होता है, अश्रद्धावान नहीं; जो प्रयत्न करनेवाला होता है, वह पूर्ति करनेवाला होता है, आलसी नहीं ; जो स्मृतिमान होता है, वह पूर्ति करनेवाला होता है, मुढ़-स्मृतिमान नहीं; जो एकाग्रता-युक्त होता है वह पूर्ति करनेवाला होता है, एकाग्रता-रहित नहीं; प्रज्ञावान पूर्ति करनेवाला होता है, दुष्प्रज्ञ नहीं।
महानाम ! तुम इन पाँच गुणों में प्रतिष्ठित होकर और छ: धम्म का भी अभ्यास करना।
1) बुद्धानुसती:
महानाम! तुम तथागत का अनुस्मरण करना।
'वह भगवान अर्हत हैं, सम्यक सम्बुद्ध हैं, विद्या तथा आचरण से युक्त हैं, सुगत है, लोक के जानकार है, अनुपम हैं, (द्रष्टा-) पुरुषोंका दमन करनेवाले सारथि हैं, देव-मनुष्यों के शास्ता हैं, बुद्ध भगवान हैं।', महानाम ! जिस समय अरिय-श्रावक तथागत का अनुस्मरण करता है, उस समय उसका चित्त राग-युक्त नहीं होता, द्वेष-युक्त नहीं होता, मोह-युक्त नहीं होता, उस समय तथागत को लेकर उसका चित्त ऋजु ही होता है।
महानाम !जिस अरिय-श्रावक का चित्त ऋजु होता है, उसे अर्थ-बोध हो जाता है, धम्म-बोध हो जाता है, उसे धम्माश्रित मोद प्राप्त होता है। जो प्रमुदित होता है, वह प्रीतिको प्राप्त होता है। जिसके मनमें प्रीति उत्पन्न होती है, उसका चित्त (क़ाम ) शान्त होता है, शान्त चित्तवाला सुख अनुभव करता है, सुखी का मन एकाग्र होता है ।
महानाम ! इसे कहते हैं कि अरिय - श्रावक विषमता को प्राप्त हुई जनता में रहता हुआ, वैषम्य-रहित जीवन व्यतीत करता है, व्यापाद-युक्त प्रजा में अव्यापाद का जीवन व्यतीत करता है, धम्म के स्रोत को समर्पित हुआ बुद्धानुस्मृति की भावना करता है।
2) धम्मानुसती:
फिर महानाम ! तुम धम्म का अनुस्मरण करना। भगवान द्वारा धम्म सु-आख्यात है, सांदृष्टिक है,अकालिक है, इसके बारे में कहा जा सकता है कि ' आओ और स्वयं देख लो', ऊपर उठाने वाला है, प्रत्येक विज्ञ आदमी स्वयं साक्षात्कार कर सकता है।' महानाम ! जिस समय अरिय-श्रावक धम्म का अनुस्मरण करता है, उस समय उसका चित्त राग-युक्त नहीं होता, द्वेष-युक्त नहीं होता, मोह-युक्त नहीं होता, उस समय धम्म को लेकर उसका चित्त ऋजु ही होता है। महानाम ! जिस अरिय-श्रावक का चित्त ऋजु होता है, उसे अर्थ-बोध हो जाता है, धम्म-बोध हो जाता है। उसे धम्माश्रित मोद प्राप्त होता है। जो प्रमुदित होता है, वह प्रीति को प्राप्त होता है, जिसके मन में प्रीति उत्पन्न होती है, उसका चित्त ( काम ) शान्त होता है, शान्त, चित्तवाला सुख अनुभव करता है, सुखी का मन एकाग्र होता है। महानाम ! इसे कहते हैं कि अरिय-श्रावक विषमता को प्राप्त हुई जनता में रहता हुआ वैषम्य-रहित । जीवन व्यतीत करता है, व्यापाद-युक्त प्रजा में अव्यापाद का जीवन व्यतीत करता है। धम्म के स्रोत को समर्पित हुआ हुआ धम्मानुस्मृति की भावना करता है।
3) संघानुसती:
फिर महानाम! तुम संघ का अनुस्मरण करना।
भगवान का श्रावकसंघ सुप्रतिपन्न हैं, भगवानका श्रावक-संघ ऋजु-मार्गारूढ़ है, भगवानका श्रावक-संघ न्याय-मार्गारूढ़ है, भगवानका श्रावक-संघ समीचीन मार्ग पर आरूढ़ है, यह जो (अरिय-) पुरषों के चार जोड़े हैं, ये जो आठ व्यक्ति हैं, यही भगवान का श्रावक संघ है। यह संघ आदर करने योग्य है, पहुनाई करने योग्य है, दक्षिणार्ह है, हाथ जोड़ने के योग्य है, लोगों के लिए अनुपम पुण्य-क्षेत्र है।' महानाम ! जिस समय अरिय-श्रावक संघ को अनुस्मरण करता है, उस समय उसका चित्त राग-युक्त नहीं होता, द्वेष-युक्त नहीं होता, मोह-युक्त नहीं होता, उस समय संघ को लेकर उसका चित्त ऋज़ ही होता है। महानाम ! जिस अरिय-श्रावक का चित्त ऋजु होता है, उसे अर्थ-बोध हो जाता है, धम्म-बोध हो जाता है, उसे धम्माश्रित मोद प्राप्त होता है। जो प्रमुदित होता है, वह 'प्रीति को प्राप्त होता है, जिसके मनमें प्रीति उत्पन्न होती है, उसका चित्त ( काम ) शान्त होता है, शान्त चित्तवाला सुख अनुभव करता है, सुखी का मन एकाग्र होता है। महानाम ! इसे कहते हैं कि अरिय-श्रावक विषमता को प्राप्त हुई जनता में रहता हुआ वैषम्य-रहित जीवन व्यतीत करता है, व्यापाद-युक्त प्रजा में अव्यापाद का जीवन व्यतीत करता है, धम्म के स्रोत को सर्मापत हुआ संघानुस्मृति की भावना करता है।
4)शीलानुसती:
फिर महानाम ! तुम अपने शीलों का अनुस्मरण करना।
अखण्डित, छिद्र-रहित, धब्बे-रहित, दाग-रहित, स्वतंत्र, विज्ञ पुरुषों द्वारा प्रशंसित, स्वच्छ, समाधि की ओर ले जानेवाले। महानाम ! जिस समय अरिय-श्रावक अपने शीलों का अनुसरण करता है, उस समय उसका चित्त राग-युक्त नहीं होता, द्वेष-युक्त नहीं होता, मोह-युक्त नहीं होता,उस समय शील को लेकर उसका चित्त ऋजु ही होता है । महानाम! जिस अरिय-श्रावक का चित्त ऋज होता है, उसे अर्थ-बोध हो जाता है, धम्म-बोध हो जाता है, उसे धम्माश्रित मोद प्राप्त होता है। जो प्रमुदित होता है, वह प्रीति को प्राप्त होता है; जिसके मन में प्रीति उत्पन्न होती है, उसका चित्त (काम) शान्त होता है, शान्त चित्तवाले सुख का अनुभव करता है, सुखी का मन एकाग्र होता है । महानाम ! उसे कहते हैं कि अरिय-श्रावक विषमता को प्राप्त हुई जनता में रहता हुआ वैषम्य-रहित जीवन व्यतीत करता है, व्यापाद-युक्त प्रजा में अव्यापाद का जीवन व्यतीत करता है। धम्म के स्रोत को समर्पित हुआ हुआ शीलानुस्मृति की भावना करता है।
5) त्यागानुसती:
फिर महानाम ! तुम अपने त्याग का अनुस्मरण करना।
यह मेरे लिए कितने बड़े लाभ की बात है, सुलभ की बात है कि मैं मात्सर्य से युक्त प्रजा के बीच में रहता हुआ मात्सर्य से रहित हो गृहस्थ जीवन व्यतीत करता हैं—मुक्त-त्यागी, खुलाहाथ रखकर परित्याग-रत, याचकों का सहायक बन, दानशील तथा बाँटनेवाला। महानाम ! जिस समय अरिय-श्रावक अपने त्याग का अनुस्मरण करता है, उस समय उसका चित्त राग-युक्त नहीं होता, द्वेष-युक्त नहीं होता, मोह युक्त नहीं होता, उस समय त्यागको लेकर उसका चित्त ऋजु ही होता है। महानाम ! जिस अरिय-श्रावक का चित्त ऋजु होता है, उसे अर्थ-बोध हो जाता है, धम्म-बोध हो जाता है, उसे धम्माश्रित मोद प्राप्त होता है। जो प्रमुदित होता है, वह प्रीति को प्राप्त होता है; जिसके मन में प्रीति उत्पन्न होती है, उसका चित्त शान्त हो जाता है, शान्त चित्तवाला सुख का अनुभव करता है, सुखी का मन एकाग्र होता है। महानाम ! इसे कहते हैं कि अरिय-श्रावक विषमता को प्राप्त हुई जनता में रहता हुआ वैषम्य-रहित जीवन व्यतीत करता है। व्यापाद-युक्त प्रजा में अव्यापाद का जीवन व्यतीत करता है, धम्म के स्रोत को समर्पित हुआ त्यागानुस्मृति की भावना करता है।
6) देवतानुसती:
फिर महानाम ! तुम देवतानुस्मरण करना।
चातुर्महाराजिका देवता हैं, त्रयोत्रिश देवता हैं, याम देवता हैं, तुषित देवता हैं, निर्माण-रति देवता हैं, परनिमित वशवर्ती देवता हैं, ब्रह्मकायिक देवता हैं, और इनसे ऊपरके भी देवता हैं। जैसी श्रद्धा से समन्वित होकर वे यहाँ से च्युत होकर वहाँ उत्पन्न हुए, मेरे पास भी वैसी श्रद्धा है; जैसे शील से समन्वित होकर वे यहाँ से च्युत होकर वहाँ उत्पन्न हुए, मेरे पास भी वैसा शील है; जैसे श्रुत से समन्वित होकर वे यहाँ से च्युत होकर वहाँ उत्पन्न हुए, मेरे पास भी वैसा श्रुत (ज्ञान) हैं; जैसे त्याग से समन्वित होकर वे यहाँ से च्युत होकर वहाँ उत्पन्न हुए, मेरे पास भी वैसा त्याग है; जैसी प्रज्ञा से समन्वित होकर वे यहाँ से च्युत होकर वहाँ उत्पन्न हुए, मेरे पास भी वैसी प्रज्ञा है। महानाम ! जिस समय अरिय-श्रावक अपनी और उन देवताओं की श्रद्धा, शील, श्रुत (-ज्ञान), त्याग तथा प्रज्ञा का अनुस्मरण करता है, उस समय उसका चित्त राग-युक्त नहीं होता, द्वेष-युक्त नहीं होता, मोह-युक्त नहीं होता, उस समय देवताओं को लेकर उसका चित्त ऋजु ही होता है। महानाम ! जिस अरिय-श्रावक का चित्त ऋजु होता है, उसे अर्थ-बोध हो जाता है, धम्मबोध हो जाता है, उसे धम्माश्रित मोद प्राप्त होता है। जो प्रमुदित होता है, वह प्रीति को प्राप्त होता है; जिसके मन में प्रीति उत्पन्न होती है, उसका मन शान्त हो जाता है, शान्त चित्तवाला सुख का अनुभव करता है, सुखी का मन एकाग्र होता है। महानाम ! - इसे कहते हैं कि अरिय-श्रावक विषमताको प्राप्त हुई जनता में रहता हुआ वैषम्यरहित जीवन व्यतीत करता है, व्यापाद-युक्त प्रजा में अव्यापाद का जीवन व्यतीत करता है, धम्म के स्रोत को समर्पित हुआ देवतानुस्मृति की भावना करता है।
नमो बुद्धाय🙏🏼🙏🏼🙏🏼
Ref: प्रथम महानाम सुत्त:अँगुत्तर निकाय
21.07.2023


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