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🌻धम्म प्रभात🌻

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नालन्दा 

नालन्दा का महाविहार बहुत विशाल और गगनचुम्बी था।  यह शिक्षा संस्थान के रूप में जगत प्रसिद्ध  विश्वविद्यालय था।

प्राचीन काल का प्रसिद्ध नालन्दा इतिहासकारों, पुरातत्ववेत्ताओं के लिए आज तक भी गहन अध्ययन का विषय है।
प्राचीन बौद्ध ग्रंथ और श्रीलंका के पालि साहित्य में नाल अथवा नालक  ग्राम को प्राचीन नालन्दा होने का संकेत मिलता है।  सारिपुत्त  के जन्म स्थान  नालक को ही नालन्दा कहते है। नवनालन्दा के निकट एक छोटा सा गांव है जिसको निवासी अपने गांव को नालन्दा  कहते है। 

सर्वप्रथम जनरल कनिंघम ने नालन्दा की पहचान  बडगांव  के समीप वर्तमान  में भगवान बुद्ध के अग्रश्रावक धम्म सेनापति सारिपुत्त के चैत्य से की है। जिसे अलग-अलग समय अलग-अलग  राजाओं ने चार मंजिला बनवाया था।  जो आज भी सारिपुत्त का चैत्य  खण्डित अवस्था में खण्डहर  के रूप में चार मंजिलों को दर्शाते हुए स्वाभिमान पूर्वक खडा है।
आज नालन्दा को जनपद के नाम से जाना जाता है जिसका  मुख्यालय  बिहार शरीफ  है। नालन्दा  राजगीर  से 13 किलोमीटर और पटना से 90 किलोमीटर  दूरी पर स्थित है।

जनता को शीलवान, प्रज्ञावान,  श्रद्धा-सम्पन्न और धार्मिक  बनाने के लिए  महाराजा कुमार गुप्त ने (ईस्वी 415-455 ) में नालन्दा विश्वविद्यालय  की स्थापना की जिस में देश- देशांतर  के विद्यार्थी पढने आते थे। समय-समय मगध साम्राज्य  के राजाओं  का नालन्दा के उत्थान में सहयोग रहा। महाराजा हर्षवर्धन का थानेश्वर, कन्नौज और  मगघ पर साम्राज्य होने के कारण उसने नालन्दा विश्वविद्यालय  को पूर्ण सहयोग  किया था।
बौद्ध इतिहास के आधार  पर जानकारी उपलब्ध है कि पालवंश के राजाओं का 8वीं सदी से12वीं सदी तक नालन्दा  को विशेष संरक्षण प्राप्त हुआ  था।
चीनी यात्री फाहियान और  इत्सिंग ने नालन्दा की मुलाकात ली थी। चीनी यात्री फाहियान ने अपने यात्रा विवरण में नालन्दा के सम्बन्ध में मात्र चैत्य का उल्लेख किया था। वह चैत्य  सारिपुत्त के परिनिर्वाण  के स्थान पर बना हुआ था, वह आज भी विद्यमान  है। फाहियान की यात्रा के समय नालन्दा विश्वविद्यालय की स्थापना नहीं होगी। लेकिन चीनी यात्री इत्सिंग की यात्रा  विवरण  से नालन्दा विश्वविद्यालय की जानकारी मिलती है।  इत्सिंग  सन 673 ईस्वी  में नालन्दा  आया था।  इत्सिंग के अनुसार  उस समय यहां पर भिक्खुओं की संख्या  300 से अधिक  थी। 

यहां पर पढने वाले विद्यार्थियों के अभिभावकों पर किसी भी प्रकार का कोई खर्च नहीं था यानि नि:शुल्क पढाई  दि जाती थी।

चीनी यात्री में सबसे प्रसिद्ध  यात्रीहुयेनसांग था। वह बौद्ध  धम्म का अनुयाई था और  अध्ययन करने के लिए नालन्दा आया था।  उसने नालन्दा  में 6 वर्ष  तक अध्ययन  किया था। वह भारत में 15 वर्ष  तक रहा।  हुयेनसांग ने बौद्ध महाविहार के अध्यक्ष शीलभद्र आचार्य के चरणों में बैठकर विद्याभ्यास किया था। 
हुयेन सांग  के अनुसार उस समय  नालन्दा में 8500 विद्यार्थी और  1500 शिक्षक थे। शिक्षक और  विद्यार्थी विश्वविद्यालय परिसर में ही रहते थे।  इस विश्वविद्यालय में 8 हॉल और  300 कमरे थे।  इस में तीन मंजिला वाले तीन  पुस्तकालय- रत्नोदधि, रत्न सागर  और  रत्न  रंजक  नाम से अवस्थित थे। भवन निर्माण का कार्य  निरंतर  चलना रहता था।  नालन्दा में पढने के लिए  कोरिया, मंगोलिया, जापान, चीन, तिब्बत  और श्रीलंका  आदि देशों से विद्यार्थी और  विद्वान आते थे। यहां पर कला, साहित्य, विज्ञान, शिल्प  और उद्योग की शिक्षा दी जाती थी ।

नालन्दा में प्रवेश हेतु एक मौखिक  और  लिखित  परीक्षा  होती थी। जिस में मात्र 10 प्रतिशत  विद्यार्थी ही पास होते थे।  नालन्दा का द्वारपाल  ही इतना  परिपक्व, प्रकाण्ड विद्वान होता था  कि विद्यार्थी  अपनी योग्यता  का अनुमान  उसके प्रश्नों  के माध्यम से कर लेते थे। बहुत से विद्यार्थी उसके  प्रश्नों के उत्तर  देने में असमर्थ  होते थे और  वे द्वार  से ही बिना  परीक्षा  दिए  वापिस चले जाते थे। विद्यार्थियों  की शिक्षा का सम्पूर्ण खर्च  स्वयं विद्यालय  उठाता था। तत्कालीन  समय के सभी राजा  विद्यालय  को सहयोग करते थे। 

नालन्दा के सुप्रसिद्ध  आचार्य थे- आचार्य  धम्मपाल (चंद्रपाल) , गुणमति,  स्थिरमति, प्रभाकर मित्र, जिन मित्र और शीलभद्र  आदि।  हुयेनसांग नालन्दा के आचार्य के पद पर रहे थे। नालन्दा में 499 भिक्खौओं ने अर्हत्व प्राप्त किया था।


भिक्खु हुयेनसांग ने नालन्दा का आंखे देखा हाल यात्रा विवरण ग्रंथ सी. यू. की. में वर्णित किया है। वर्णन निम्न प्रकार किया गया है-

"सम्पूर्ण  संस्थान के चारों ओर ईंटों का परकोटा है। एक फाटक से होकर हम एक बडे विद्यालय में पहुंचते है। जहां से अलग-अलग पाठशालाओं को मार्ग गए है, जो बीचों बीच बनें है। मनोहर दुर्ग और  आकाश से बातें करने वाले  कंगूरे  पहाडों की भांति  एक दूसरे से सटे दिखाई  देते है।  वेधशाला कोहरे के कारण दिखाई नही  देती है।  परंतु,  आकाश से बातें करते हुए उसके उपरी कमरे की झलक अवश्य दिखाई देती है।  प्रशालाओं के बाहर प्राचार्यों  के लिए  भवन बनें हुए हैं। उन पर चार- चार मचान बने हुए हैं।  उन पर सर्प के फन जैसे छत्र  लगें हैं। रंगी हुई कन्दराएं  और  चमकीले खम्भे  खुदाई  करके बनाए  हैं, जिनकी सजावट  रमणीय है। उनके कठघरों की शोभा चित्त को बरबस लुभाती है। रंग- बेरंगी प्रकाश  रश्मियां विद्यालय के भवनों की छतों  से टकरा कर सौन्दर्य ढूंढने के लिए विश्वविद्यालय  के भीतर  इधर-उधर  बिखर जाती है। "

नालन्दा की दीवारें  6 फुट से 12 फुट मोटी ईंटों  की बनी हुई  है।  इसकी छतें, बिना  लोहे  अथवा पत्थर  के पटाव  से वैज्ञानिक तकनीक द्वारा  डाट लगा कर बनाई गई है।  नालन्दा  विश्वविद्यालय परिसर  के अन्दर  लगभग  200 फुट  का एक गहरा  अष्टकोणीय  कुंवा  था जो आज भी देखने  को मिलता है।  नालन्दा  विश्वविद्यालय  की मौहर आज भी  राष्ट्रीय  संग्रहालय नालन्दा  में मौजूद है जिस पर दो हाथी  अंकित है जो बौद्धों  के पुरखों के राष्ट्रचिन्ह थे।

इस सर्वश्रेष्ठ  विश्वविद्यालय को सन 1897 में मोहम्मद घोरी  के सेनापति  बख्तियार खिलजी ने आक्रमण करके तहस-नहस कर दिया था।  उसने नालन्दा विश्वविद्यालय को आग लगा कर  नष्ट  कर दिया ।  उस समय देश-विदेश के 6 हजार अध्ययनरत विद्यार्थीयों को मौत के घाट उतार दिया था। बौद्ध भिक्खुओं की कत्लेआम कर दी थी। विशाल पुस्तकालय को आग लगाई थी। पुस्तकालय  में लगातार 6  महीने तक आग जलती रही जिसमें 9 लाख  महत्वपूर्ण ग्रंथ जलकर राख हो गए थे। आक्रमण के समय बहुत से भिक्खु  अपनी जान की परवाह न करते हुए  वे अपने साथ मूल्यवान हस्तलिखित ग्रंथो को लेकर पडोसी देशों में भाग चले थे।  इन में तिब्बत  के विहारों में भारत से ले जाए हस्तलिखित  ग्रंथ आज भी मौजूद  हैं।
नालन्दा विश्वविद्यालय परिसर की मुलाकात लेते समय  नालन्दा में राष्ट्रीय संग्रहालय देखना चाहिए, बडगांव की धरती पर टहलना चाहिए और  तेलिया बाबा ( बुद्ध की प्राचीन  प्रतिमा) देखनी चाहिए। 
नालन्दा महाविहार के परिसर में सारिपुत्त स्तूप पर उन धम्म सेनापति के अनंत उपकार को याद करके वंदना करनी चाहिए।  उन हजारों भिक्खुओं और  विद्यार्थीयों की कत्ल हुई थी उनकी चेतना को नमन करके नालन्दा विश्वविद्यालय का भ्रमण करना चाहिए। 

नमो बुद्धाय🙏🏼🙏🏼🙏🏼
30/08/2023

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