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प्राचीन काल समय में दहेज प्रथा का कोई प्रचलन नहीं था

दुल्हन ही दहेज है जैसी सोच बनानी होगी 

भीम प्रकाश बौद्ध उप संपादक मध्य प्रदेश मो  9754 84 3705
 
भिंड :- प्राचीन काल में जो शादियां होती थी वह बिना दहेज की होती थी माता-पिता अपनी बिटिया को दहेज में बर्तन दिए जाते थे लेकिन वर्तमान समय में इसका समय बदल गया है दहेज की कु प्रथा आज समाज में लाइलाज बीमारी बन गई है इसके बिना कोई भी कार्य नहीं होता है बिटिया पढ़ी-लिखी हो या ना पढ़ी लिखी हो उनको तो सिर्फ धन से मतलब होता है आज हम हाईटेक योग में प्रवेश कर चुके हैं शिक्षा भी प्राप्त कर ली है लेकिन हम पूर्ण तरह से  शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाए हैं चारों तरफ से दहेज चाहिए जैसी याचनाएं कोने-कोने से टकराकर आ रही है चाहे वह गरीब हो या अमीर हो हम अपनी संकीर्ण सोच को नहीं बदल पाए हैं दहेज में धन दे दो वह व्यक्ति अच्छा है कि बुरा है इससे कोई सरोकार नहीं रहा है इस प्रकार हम शिक्षित होने के बावजूद भी शिक्षा का लेवल चिपका हुआ है हम पूर्ण तरह से समझदार नहीं हुए हैं इस दहेज प्रथा ने कई नई नवेली दुल्हन का खून पिया है इसके वजह से अच्छा रिश्ता नहीं मिल पाता है लेकिन हमारा समाज आज भी पुरानी परंपराओं और रूढ़ियों पर टिका हुआ है जब तक अपनी सोच को संकीर्ण बनाए रखेंगे जब तक यह दहेज नामक राक्षस हम नहीं जीत पाएंगे सब लोगों को समझना होगा कि दहेज प्रथा यह पुरानी परंपरा है आज हम 21वीं शदी में प्रवेश कर चुके हैं लेकिन हमको यह समझ में नहीं आ रहा है दहेज प्रथा एक नासूर बन चुका है जब तक इसको समाप्त नहीं किया जाता जब तक हम चैन से नहीं बैठेंगे ऐसी सोच को विकसित करना होगा तभी सही मायने में हम एक पढ़े-लिखे इंसान कहलाएंगे आज हमारे समाज में पढ़ लिखकर ऊंची डिग्रियां प्राप्त कर लेते हैं लेकिन हम सही मायने में डिग्रियों का महत्व नहीं समझ पाए तहसीलदार एसडीम कलेक्टर शिक्षक हम सब कुछ बन जाते हैं फिर भी हम दहेज के प्रति उतावले क्यों रहते हैं हम यदि दहेज मांग रहे हैं तो हम सही मायने में पढ़े- लिखे नहीं है हम सबको दहेज के पीछे नहीं पढ़ना है ना ही मांगना है इस प्रकार की सोच को समाज में बनानी होगी तभी हम एक शिक्षक नागरिक कहलायेंगे क्योंकि दहेज प्रथा आज के समय की एक विकट समस्या है जब तक हम दहेज नामक राक्षस को नहीं हटाएंगे जब तक हमारी नई नवेली दुल्हन इसी प्रकार से फांसी के फंदे पर झूलती रहेगी इस दहेज प्रथा एक पिता का सुख चैन छीना है फिर फिर भी यह है हमारे बीच से खूब फल फूल रहा है यदि हम आप सबने सोच को संकीर्ण बनाए रखा और दहेज प्रथा को मांगते रहे तो शायद हम उसे ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाएंगे जिस ऊंचाई तक हमने कल्पना की है क्योंकि हम दहेज जैसी क प्रथाओं के पीछे भागते रहे तो हम अपने समाज को कैसे जागरूक रख सकते हैं हमारे समाज में अनेक प्रथाएं व्याप्त है जिन को हटाना होगा तभी सही मायने में हम एक पढ़े-लिखे व्यक्ति कहलाएंगे अतः नासूर बन चुके इस दहेज प्रथा को जड़ मूल से हटाना होगा

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