दुल्लभो बुद्धां उप्पादो लोकस्मिं।
बुद्ध का उत्पन्न होना दुर्लभ होता है।
हमारे शास्ता गौतम बुद्ध का जन्म शाक्य वंश के राजा शुद्धोधन और राणी महामाया के घर वैशाख पूर्णिमा के दिन लुम्बिनी वन में हुआ। बुद्ध का जन्म का नाम सिद्धार्थ रखा गया। राजकुमार सिद्धार्थ का विवाह कोलिय राजकुमारी यशोधरा से हुआ। उनको राहुल नाम का बेटा हुआ । तब सिद्धार्थ गौतम ने महाभिनिष्क्रण ( गृहत्याग ) किया उस समय उनकी उम्र 29 साल थी। सत्य की खोज में उन्होंने छ: वर्ष तक ध्यान साधना की। और वैशाख पूर्णिमा की रात को उनको ज्ञान प्राप्त हुआ, सम्बोधि प्राप्त हुई, वे सम्यक संबुद्ध हुए।
सम्यक सम्बोधि प्राप्त करने के बाद 45 साल तक यानि 80 वर्ष की उम्र तक लोगो के हित और कल्याण के लिए धम्म के उपदेश दिए। वैशाख पूर्णिमा की रात को अंतिम उपदेश देकर कुशीनगर में महापरिनिर्वाण प्राप्त किया।
ऐसे करूणानिधान बुद्ध का जन्म दुर्लभ होता है और उनका उत्पन्न होना सुखकर होता है, उनकी देशना सद्धर्म होती है।
"सुखो बुद्धानं उप्पादो,
सुखो सद्धम्म देशना ।"
अज्ञ-नादान लोग बुद्ध पर दु:खवादी होने का मिथ्या आरोप लगाते है। आरोप है कि-
बुद्ध दु:ख की बात करते है। बुद्ध सुख की बात नहीं करते है।
जबकि बुद्ध कहते है- दु:ख है, दु:ख का कारण है, बिना कारण दु:ख उत्पन्न होता नहीं है। इन अर्थों में दुःख सम्बुद्ध की देशना का आधार है। भगवान बताते हैं कि दु:ख का कारण है, तो दु:ख निवारण का उपाय भी है। दु:ख निरोध का उपाय भी है, अर्थात दुःख क्षेत्र का अतिक्रमण करने वाले सभी लोगों को सहज सुख उपलब्ध है। बुद्ध की इस सत्य देशना को बिना समझे नादान लोग बुद्ध पर दु:खवादी या निराशावादी होने का लांछन लगाते है।
एक वैज्ञानिक की भांति बुद्ध ने "दु:ख" रोग को जाना, दु:ख होने के कारण को जाना, जिन कारणों से दु:ख उत्पन्न होता है उसे दूर करने के उपाय भी जाने और जानने के बाद परम समाधान के रूप में अरिय मज्झिमा प्रतिपदा का मार्ग दिखाया।
भगवान बुद्ध ने कहा-
"आरोग्य परमा लाभा,
सन्तुट्ठि परमं धनं।
विस्सासपरमा
निब्बानं परमं सुखं।।"
अर्थात-
निरोग होना परम लाभ है, सन्तोष परम धन है, विश्वास सबसे बड़ा बन्धु है। निर्वाण सबसे बड़ा सुख है।
बुद्ध ने दु:ख के समूल उच्छेद व भव मुक्ति के लिए उपदेश दिया है, जिसके परिणाम में सहज व परम सुख ही उपलब्ध होता है, इसलिए भगवान बुद्ध सुखवादी है, न कि दु:खवादी।
"सुखो बुद्धानं उप्पादो ।"
अर्थात-
सुखदायक है- बुद्धों का जन्म। बुद्ध की बोधि सुखकर है।
भगवान बुद्ध से द्रोण ब्राह्मण ने पूछा कि-
क्या आप देवता नहीं है?
"दोण ! मैं सच में देवता नहीं हूं.
"क्या तथागत आप गंधर्व नहीं हैं?
दोण! मैं सच में गंधर्व नहीं हूं.
तो तथागत आप यक्ष नहीं हैं ?
"दोण ! मैं सच में यक्ष नहीं हूं.
तो तथागत क्या आप मनुष्य भी नहीं है?
"दोण! वास्तव में मैं सामान्य मनुष्य नहीं हूं.
तथागत के उत्तर सुनकर दोण ब्राह्मण बोला-
"तथागत आप कहते हैं कि आप देवता नहीं है, आप गंधर्व नहीं है, आप यक्ष नहीं हैं,और आप मनुष्य भी नहीं है, तो तथागत आखिर आप क्या हैं? कौन हैं ?
दोण ब्राह्मण ! मैं वास्तव में देव, एक गंधर्व, एक यक्ष, एक मनुष्य ही होता, यदि मैंने अपने मन के विकारों, मन के मैल का नाश नहीं किया होता। मैंने मन की अशुद्धियों को जड़ से ही उखाड़ दिया है। अब वे विकार फिर से वृक्ष बन कर अस्तित्व में नहीं आ सकते। जिस प्रकार कमल पानी में उगता है, पानी में बढ़ता है फिर पानी की सतह से ऊपर निकल कर, पानी से अलग बेदाग निष्कलंक होकर रहता है।
"हे दोण ! मैंने संसार में जन्म लिया है, संसार में बड़ा हुआ हूं किंतु मैंने अपने मन के सारे विकारों को जड़ मूल नष्ट कर दिया है। अब संसार को जीतकर संसार से अलग बेदाग होकर रहता हूं।
इसलिए, हे ब्राह्मण दोण! अब तुम मुझको 'बुद्ध' जानो, मैं बुद्ध हूं।
अहो,संसार कष्ट में पड़ा है। भगवान ने कहा-
"जाति च जीयति च चवति च उपपज्जति च"
अर्थात-
जन्मता है, जीर्ण होता है, मरता है,च्युत होता है, और फिर उत्पन्न होता है। यही संसार में दुःख है।
बोधिसत्व जब इन प्रश्नों का उत्तर ढूंढ लेते हैं, बुद्ध होते है और तब जान लेते हैं-
"इमस्मिं सति इदं होति,
इमस्सुप्पादा इदं उप्पज्जति।।
अर्थात-
इसके(तृष्णा) होने से ये(दुःख) होता है। इससे उत्पन्न होने से यह उत्पन्न हो जाता है। प्रत्यय होता है,तो उत्पाद होता है। कारण होता है, तो परिणाम उत्पन्न होता है। बीज होता है, तो फल उत्पन्न होता है।
तृष्णा के कारणों से दुःख उत्त्पन्न होता है?
"इमस्मिं असति इदं न होति,
इमस्स निरोधा इदं निरूज्झति।।"
अर्थात-
इसके (तृष्णा) न होने से यह(दुःख)नहीं होता। इसके निरोध हो जाने से यह भी निरूद्ध हो जाता है।
तृष्णा का निरोध होता है?
तृष्णा ही संसार में सभी दु:खों का मूल है। तृष्णा के कारण ही राग द्वेष और मोह उत्पन्न होते हैं। राग द्वेष और मोह का समुच्छेद प्रहाण करने के लिए मनुष्य को शील समाधि और प्रज्ञा का अभ्यास करना चाहिए। तृष्णा का क्षय यानी दु:खों से मुक्ति। यही सनातन सत्य है।
भगवान ने यह भी कहा-
चार धर्मों से युक्त ही सुखी होता है।
कौन से चार?
"भिक्खुओ! चार धर्मों से युक्त मूर्ख, नासमझ असत्पुरुष अपने आपको क्षत (कटा-पिटा) एवं उपहत (व्रणित =घायल) समझता है। तथा वह इन धर्मों का सेवन करते हुए अपने लिए बहुत अधिक अपुण्य (पाप) सञ्चित कर लेता है।
कौन से चार धर्म ?
(1) बिना सोचे, बिना समझे किसी निन्दनीय पुरुष की प्रशंसा करता है,
(2) बिना सोचे समझे किसी प्रशंसनीय पुरुष की निन्दा करता है।
(3) बिना सोचे, बिना समझे किसी अ-श्रद्धेय स्थान में अपनी श्रद्धा प्रकट करता है,
(4) किसी श्रद्धेय स्थान के प्रति अपनी अ-श्रद्धा प्रकट करता है।
भिक्खुओं! इन चार धर्मों से युक्त मूर्ख, नासमझ असत्पुरुष अपने आपको क्षत (कटा-पीटा)एवं उपहत (घायल) अनुभव करता है। वह दोष सहित जीवन बिताता है, तथा विज्ञजन (धम्म अनुभवी ) उसकी समालोचना ही करते हैं।
भिक्खुओ! चार धर्मों से युक्त बुद्धिमान एवं चतुर पुरुष अपने आपको स्वस्थ एवं अनुपहत (ठीक ठाक) अनुभव करता है, अपने को निर्दोष मानता है तथा विद्वज्जन भी इसकी प्रशंसा ही करते हैं। तथा इन चार धर्मों के सेवन से वह अपने लिये अतिशय पुण्यराशि एकत्र कर लेता है।
किन चार धर्मों से ?
(1) सोच-समझकर प्रशंसनीय की प्रशंसा करता है,
(2) निन्दनीय की निन्दा करता है। तथा
(3) किसी श्रद्धेय में श्रद्धा एवं
(4) अ-श्रद्धेय में अ-श्रद्धा प्रकट करता है।
भिक्खुओ इन चार धर्मों से युक्त पुरुष अपने आपको स्वस्थ... पुण्यराशि एकत्र कर लेता है।
“जो निन्दय पुरुष की प्रशंसा करता है, तथा प्रशस्त पुरुष की निन्दा करता है, वह ऐसा करता हुआ, अपने मुख के माध्यम से अपने लिए पाप ही एकत्र करता है। अतः उस पाप के कारण वह सुखमय जीवन नहीं बिता सकता ।
"लोक में यदि कोई जुंआरी अपने साथ अपने सर्वस्व सहित स्वकीय समस्त धन हार जाय, तब भी यह पाप उससे अल्प ही माना जायगा कि कोई अन्य दुष्ट पुरुष तथागत के प्रति अपना मन मैला करता है, उनसे ईर्ष्या, द्वेष करता है। यही सबसे महान पाप है। "
जो अरिय (निर्विकार सत्पुरुष) के प्रति अपना मन या वाणी दूषित करता है (अपशब्द बोलता है) उसका यदि लाखों वर्षों तक भी नरकपात हो तो भी अल्प ही है ।
सुखो बुद्धानं उप्पादो, एतेन सच्चवज्जेन, सोत्थि ते होतु सब्बदा।
नमो बुद्धाय🙏🙏🙏
22.05.2024


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