[कोई सचमुच ज्ञानी होगा तो वह क्रोध का गुलाम होगा ही नहीं।]
आलसी, कामभोगी गृहस्थ अच्छा नहीं होता, न ही संयम विहीन गृहत्यागी
प्रव्रजित, बिना सोचे समझे निर्णय करने वाला शासक अच्छा नहीं होता, और न
ही क्रोधयुक्त ज्ञानी पंडित व्यक्ति। कोई सचमुच ज्ञानी होगा तो वह क्रोध का
गुलाम होगा ही नहीं।
समझदार व्यक्ति सदा अपनी सही सुरक्षा करता है। वह अपनी सुरक्षा में ही
औरों की भी सुरक्षा देखता है। समझदार व्यक्ति सदा ओरों की सही सुरक्षा करता है। वह औरों की सुरक्षा में ही अपनी भी सुरक्षा देखता है।
"अत्तानं रक्खन्तो परं रक्खति,
परं रक्खन्तो अत्तानं रक्खति॥"
- वह अपनी रक्षा करता हुआ ओरों की रक्षा करता है। औरों की रक्षा करता
हुआ अपनी रक्षा करता है। सचमुच, जो स्वयं क्रोध की पहल नहीं करता और
किसी क्रोधी के पहर कर लेने पर प्रतिक्रिया स्वरूप भी क्रोध नहीं करता, ऐसा व्यक्ति ही तो अपनी और परायी सब की सही सुरक्षा करता है। ऐसा व्यक्ति ही
तो सही माने में सत्पुरुष है।
"उभिन्नमत्थं चरति,
अत्तनोच परस्सच।
परं संकुप्पितं ञत्वा,
यो सतो उपसम्मति॥"
अपने और पराये भले के लिए ही सत्पुरुष दूसरे को कुपित हुआ देखकर
स्वयं शांति धारण करता है। सचमुच इसी में तो दोनों की भलाई है। कुपित हुए पर कुपित हो जायँ तो अपनी और उसकी दोनों की ही हानि हो।
ऐ मेरे भोले मन! तू जिस धम्म-पथ का पथिक है वह तो क्षांति का पथ है।
शांति का पथ है, सहिष्णुता का पथ है, धीरज का पथ है। इस पथ पर चलने वाले सभी पथिक शांति का ही अभ्यास करते आए हैं। मैं जानता हूं कि यह तो अभी संभव नहीं है कि तुझे उन धम्मराज भगवान तथागत की तरह कभी, किसी भी अवस्था में, क्रोध आए ही नहीं, उनकी तरह तेरी भी भृकुटी कभी टेढ़ी हो ही नहीं । परंतु इतना तो अवश्य हो ही सकता है कि जब कभी तुझे क्रोध आए तब तू शीघ्र से शीघ्र उसका शमन कर ले। उसे बढ़ने न दे | बुद्ध बनने के पूर्व उस नर-श्रेष्ठ ने भी तो जन्म जन्मान्तरों में यही अभ्यास किया था। भावी-बुद्ध बोधिकुमार ने सर्वथा उकसाने वाली स्थिति में भी इस दुष्ट क्रोध को अपने सिर पर सवार नहीं ही
होने दिया। इसका सामना ही किया।
"उष्पज्जे मे न मुच्चेय्य,
न मे जीवतो।
रजंब॒ विपुला बुडि,
खिप्पमेय निवारये॥"
उठते हुए क्रोध को देखते-देखते भावी बुद्ध को यह होश था कि यह उत्पन्न
होगा तो मुझे नहीं छोड़ेगा, जीवन भर बांधे रखेगा जिस तरह उठती हुई धूल को विपुल वृष्टि द्वारा दबा दिया जाता है, वैसे ही इसका निवारण कर देना चाहिए।
और यही तो उसने किया भी।
"उप्पज्जि मे न मुच्चित्थ,
न मे मुच्चित्थ जीवतो।
रजं ब विपुला बुदि खिप्पमेव निवारयिन्ति॥"
यह क्रोध जैसे ही उत्पन्न हुआ, मैं उसके अधीन नहीं हुआ। अतः यह मुझे
जीवन भर अपना गुलाम बनाए न रख सका। (परन्तु अब) जिस प्रकार उठती हुई धूल का निवारण विपुल वर्षा द्वारा हो जाया करता है, वैसे ही मैंने इसका निवारणकर लिया।
"यम्हि जाते न पस्सति,
अजाते साधु पस्सति।
सो मे उप्पज्जि नो मुच्चि,
कोधो दुम्मेधगोचरो ॥"
कैसा अनिष्टकारक है यह क्रोध! सज्जन इसके उत्पन्न होने के पहले ही
भली-भांति देख समझ सकते हैं। इसके उत्पन्न होने पर तो सारी सूझ-बूझ नष्ट हो
जाती है। ऐसे अनर्थकारी क्रोध के उत्पन्न होने पर मैं इसके अधीन नहीं हुआ। सचमुच क्रोध तो मूर्खों की ही गोचर भूमि है।
"यस्मिञ्च जायमानम्हि,
सदत्थं नावबुज्झति।
सो मे उप्पज्नि नो मुच्चि,
कोधो दुम्मेधगोचरो॥"
जिसके उत्पन्न होने पर आदमी की सारी सद्बुद्धि नष्ट हो जाती है और वह
स्वयं अपना भला बुरा भी नहीं समझ सकता, ऐसा दुष्ट क्रोध मुझमें उत्पन्न हुआ, परंतु मैं उसके वशीभूत नहीं हुआ। अहो, क्रोध तो मूर्खो की ही गोचरभूमि है।
"येन जातेन नन्दन्ति,
अमित्ता दुक्खमेसिनो।
सो मे उप्पज्जि नो मुच्चि,
कोधो दुम्मेधगोचरो॥"
जब मुझमें क्रोध जागता है तो मेरे वे दुश्मन जो मेरा अनिष्ट चाहते हैं, जी
मुझे दुःखी देखना चाहते हैं, उनकी इच्छा पूरी होती है, वे ऐसा देखकर प्रसन्न ही होते हैं । क्योंकि क्रोध को जन्म देकर मैं अपने दुःखों को ही जन्म देता हूं। इसीलिए मुझे क्रोधान्वित देखकर वे प्रसन्न ही होते हैं। ऐसा दुःखदायी क्रोध मुझमें उत्पन्न
हुआ, परंतु मैंने उसका तुरंत शमन कर दिया। मैं उसका गुलाम न बन सका।
अहो, क्रोध तो मूर्खों की ही गोचर भूमि है।
"येनाभिभूतो कुसलं जहाति,
परक्करे विपुलञ्चापि अत्थं।
स भीमसेनो बल्वा पमद्दी,
कोधो महाराज न मे अमुच्चथ॥"
नमो बुद्धाय🙏🙏🙏
Ref: चूलबीधि जातक
26.06.2024


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