[अब सही माने में ब्राह्मण हूं- अंगणिक भारद्वाज ]
हिमवंत के समीप उत्कट (उत्कृष्ट) नगर में एक वैभव संपन्न ब्राह्मण कुल में उत्पन्न अंगणिक भारद्वाज था। युवावस्था तक पहुंचते पहुंचते विभिन्न लोकीय विद्याओं में और शिल्पों में निष्णात हुआ । परन्तु वैराग्य जागने के कारण संन्यासी हो अमरत्व के लिए तप करने निकल पड़ा। उस समय प्रचलित विधि के अनुसार अनेक प्रकार से अग्नि परिचर्या की और शरीर को कष्ट पहुंचाने वाले अनेक प्रकार के बाह्य तप किए। समझता था इससे चित्तशुद्धि होगी, भवबंधन से मुक्ति मिलेगी। पर ऐसा हुआ नहीं। सौभाग्य से बुद्ध जनपद चारिका करते हुए उस प्रदेश में से गुजरे । युवा तापस ने उनका धम्म प्रवचन सुना और अत्यंत प्रभावित होकर उनकी शरण ग्रहण की। प्रव्रज्या ली और विपश्यना साधना विधि सीखकर चिरकाल तक स्मृति और संप्रज्ञान का अभ्यास करते हुए अन्ततः अहत्व पद प्राप्त कर लिया। विमुक्ति के सुख से विभोर होकर वह अपनी जन्मभूमि की ओर गया और वहां अपने पूर्व परिवार के अनेक लोगों को उत्साहित कर धम्म में प्रतिष्ठित कर सकने में सफल हुआ।
निष्प्राण निर्जीव कर्मकांडों में और आत्मक्लेशीय मिथ्या तपों में उलझे हुए अनेक लोगों के प्रति असीम करूणा से आप्लावित होकर उन्हें मिथ्या मार्ग से मुक्त कर सत्पथ की ओर लगाने की कल्याण कामना लिए हुए वह चारिका पर निकल पड़ा । कुरूप्रदेश के किण्डिय नामक निगम से कुछ दूर अरण्य में से गुजरता हुआ, उत्तरापथ की ओर चला तो एक स्थान पर कुछेक ब्राह्मणों को एकत्र देख । उनमें से कुछ उसके पूर्व परिचित भी थे। उन्होंने पूछा, “भो! भारद्वाज, तुम्हें यह क्या सूझा? अपनी परंपरा का पथ त्यागकर तुमने यह श्रमण परंपरा का पथ क्यों अपना लिया ?
अंगणिक भारद्वाज ने उन्हें बड़े करूण चित्त से समझाया, “भव विमुक्ति के लिए चित्तशुद्धि की खोज में वन में अग्नि की उपासना करता रहा और नाना प्रकार के आत्मक्लेश दायक तप करता रहा । पर सब निरर्थक साबित हुए। मैं उनमें इसलिए उलझा रहा क्योंकि मुझे विशुद्धि के सही मार्ग की जरा भी जानकारी नहीं थी। जब सचमुच कल्याणकारी मार्ग मिला तो निहाल हो गया। कृतकृत्य हो गया। मानव जीवन सफल हो गया।"
“मैं आश्रम से आश्रम, अरण्य से अरण्य ऐसे थोथे कर्मकांड, कायकंटक तप करते हुए इसलिए भटकता रहा।
"तं सुखेन सुखं लद्धं पस्स धम्म सुधम्मतं ।
तिस्सो विज्जा अनुप्पत्ता क तं बुद्धस्स सासनं ॥"
विपश्यना का विशुद्धि-मार्ग कायक्लेश वाले तप के मुकाबले अत्यंत सुखद मार्ग है। साधक अतियों को त्यागकर सुखद मध्यम मार्ग अपनाता है
और परम सुख निर्वाण की मुक्त अवस्था प्राप्त कर लेता है। इसलिए कहता है, “मैंने सुख मार्ग से परम सुख प्राप्त किया। देखो धम्म की कैसी महानता है ! मैंने मुक्ति की तीनों विधाएं उपलब्ध की और भगवान बुद्ध के शासन को पूरा किया। याने उनकी शिक्षा आद्योपांत पालनकर जीवन-उद्देश्य सिद्ध किया।
और तत्पश्चात सत्यदर्शी ब्राह्मण भारद्वाज अपने विमलचित्त से लोक हितार्थ उद्घोषणा करता हुआ कहता है,
'ब्रह्माबंधु पुरे आसिं इदानि खो म्हि ब्राह्मणो।
तेविज्जो न्हातको चम्हि सोत्तियो चम्हि वेदगू॥"
पहले तो केवल नाम मात्र के लिए ब्राह्मण था। ब्राह्मणी नामवाली माता की कोख से जन्मा इसलिए अपने को गर्व से ब्रह्मबंधु कहता था। परन्तु अब तो नया जन्म हो गया। उन भगवान सम्यक सम्बुद्ध के उर से उत्पन्न हुआ और उनका ओरस पुत्र हूं जो कि ब्रह्मभूत हैं, ब्रह्मकाय हैं, धम्मभूत हैं, धम्मकाय हैं। धम्म से मेरा नया जन्म हुआ है अतः धम्म निर्मित हूं। ब्रह्म का शुद्ध जीवन जीता हूं अतः अब सही माने में ब्राह्मण हूं।
पहले केवल 3 वेदों के ग्रंथ पढ़ लेने के कारण नाम मात्र के लिए त्रिवेदी था परन्तु अब तो तीनों विद्याओं को पूरी करेके सही माने में त्रिवेदी हो गया हूं। दिव्य दृष्टि और पूर्व जन्मों की स्मृति ही नहीं, उन दोनों से भी ऊंची तीसरी विद्या याने आश्रव-क्षय का पूर्ण साक्षात्कार करा देने वाली विद्या प्राप्तकर अब सही माने में त्रिवेदी हूं।
पहले तो किसी नदी में स्नान कर लेने के कारण अथवा किन्हीं धर्मशास्त्रों का पारायण कर लेने मात्र से अपने आप को स्नातक कहता था। केवलनाम मात्र के लिए स्नातक था । परन्तु अब तो पावन धम्मगंगा में डुबकी लगाकर स्नातक हुआ हूं। राग, द्वेष और मोह का सर्वथा प्रक्षालन कर अक्षय निर्वाण महोदधि में डुबकी लगाकर सही माने में स्नातक हुआ हूं। केवल नाम मात्र के लिए नहीं।
नमो बुद्धाय🙏🙏🙏
13.08.2024


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