[जातिवाद का विनाश हो।]
मनुष्यों में दो ही जातियां होती है- एक स्त्री और दूसरी पुरुष।
बुद्ध ने वर्णव्यवस्था को नकारा था। अपने संघ में सभी जाति और वर्ग के लोगों के लिए प्रवेश द्वार खोले थे। राजा हो या रंक, ब्राह्मण हो या डोम सब को संघ में शामिल किया था। इतना ही नहीं, सडी-गली और दूषित वर्ण व्यवस्था को तथागत ने एक शल्यकर्ता (surgeon ) की भांति नश्तर लगाया था। जन्म पर आधारित ऊंच-नीच का अमानवीय व्यवहार को तथागत ने नकारा और कहा- जन्म से नहीं बल्कि कर्म से व्यक्ति ऊंच-नीच होता है।
बुद्ध ने कहा-
"न जच्चा वसलो होति,
न जच्चा होति ब्राह्मणो।"
- न जन्म से कोई वृषल होता है और न जन्म से कोई ब्राह्मण होता है।
"कम्मुना वसलो होति,
कम्मुना होति ब्राह्मणो।।"
- अपने कर्मों से कोई वृषल होता है, अपने कर्मों से ही ब्राह्मण।
अकुदरती जातिवादी समाज व्यवस्था ने समाज को धर्म से दूर कर दिया है। लोग जाति और वर्ण को महत्व देते हैं। कर्म और धर्म को महत्व नहीं देते है। अनेक भूले-भटके लोग अंधी मान्यताओं के कारण, अज्ञानताभरी मोह-मूढता के कारण अपनी ही घोर हानि करते हैं।
"जातित्थद्धो धनत्थद्धो,
गोत्तत्थद्धो च यो नरो।"
- जाति,धन या गोत्र के नशे में धृत हुआ व्यक्ति-
"सञ्ञातिं अतिमञ्ञेति,
तं पराभवतो मुखं।।"
- अभिमानवश अपनी ही मनुष्य जाति के अन्य लोगों को अपमानित करता है। इस प्रकार वह स्वयं अपने अध:पतन का कारण बनता है।
ऐसीे मोह-मूढता आज भारतीय हिन्दू समाज में सर्वत्र व्याप्त है। भारत का बहुसंख्यक समुदाय जातिवाद नाम के कैंसर जैसे भयंकर रोगों से पीड़ित हैं। हरेक क्षेत्र में- समाज, राजनीति, धर्म, व्यवसाय, व्यवहार आदि में जातिवाद का जहर इतना फैल गया है कि किसी को इस जहर का पता नहीं चल रहा है और इस जहर के नशे में समाज असंवेदनशील हो गया है।
आज भी अनैतिक कर्म करने वाला, चोरी करने वाला, व्यभिचार करने वाला, मूर्ख ब्राह्मण, कुशल कर्म करने वाले, नैतिक, सदाचारी, विद्वान शुद्रों { SC/ST/OBC } से अपने को ऊंच मानता है। यही अधर्म है, यही मनुष्य का अध:पतन है।
तथागत ने कहा-
"बाहित्वा पापके धम्मे,
ये चरन्ति सदा सत्ता।"
- जिन्होंने अपने मानस के सारे पाप बहा दिए,जो सदा सजग रह कर विचरण करते हैं-
"खीणसंयोजना बुद्धा,
ते वे लोकस्मि ब्राह्मणा।।"
- जिनके संयोजन-बंधन टूट गये है, ऐसे बुद्ध ही संसार में ब्राह्मण है।
लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि बुद्ध धम्म में प्रधानता गुणों की है, जाति, जन्म की नहीं है।
"कम्मं विज्जा च धम्मो च,
सीलं जीवितमुत्तमं।
एतेन मच्चा सुज्झन्ति,
न गोत्तेन धनेन वा।"
- कर्म से, विद्या से, शील से और उत्तम जीवन से ही मर्त्य मानव विशुद्ध होता है, विमुक्त होता है, न कि गोत्र से अथवा धन से।
सदाचारी समाज का निर्माण ही मनुष्य का आदर्श होना चाहिए।
जब तक समानता आधारित समाज की स्थापना नहीं होगी तब तक मानवता का हनन होता रहेगा और आदर्श समाज का निर्माण नहीं होगा।
किसी ने लिखा है-
"मानवता का खंडन करके
चार वर्ण उपजाया है।
ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य ऊंच हैं,
शूद्र को नीच बताया है।।
शूद्र को बांटा छूत-अछूत में
इनमें भी भेद कराया है।
किया हजारों टुकड़े इनके
जाति में जाति बनाया है।।
जाति-जाति में भेद बताकर
आपस में लड़वाया है।
सीधे-साधे लोगों को
यह ब्राह्मण ने मूर्ख बनाया है।।"
जातिवाद ने भारत को गुलाम बनाया था। वही जातिवाद आज भारत को कमजोर बना रहा है। हीनभावना से भरा जातिवाद का मूल हिन्दु धर्म में है। इस जातिवाद का सर्वनाश होना आवश्यक है।
नमो बुद्धाय🙏🙏🙏
24.08.2024


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