चित्रा न्युज संवाददाता
भंंडारा :-मशहूर उर्दू शायर व ग़ज़लकार बशीर बद्र साहब अब हमारे बीच नहीं रहे. हाल ही में उनका डीमेंशिया के चलते निधन हो गया. वे साहित्य जगत की एक बड़ी शख्सियत थे. उन्होंने उर्दू ग़ज़ल को जटिल, कठीण शब्दों से निकालकर आम बोलचाल की बेहद सरल, सहज भाषा में उन्होंने ढाला था जिससे वे आम आदमी व युवाओं के दिलों की धड़कन बन गए थे.
उनका जन्म उत्तर प्रदेश के अयोध्या (जिला फैजाबाद)में हुआ था. उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उर्दू में पीएचडी की और वहीं प्रोफेसर की नौकरी भी. बशीर साहब की ग़ज़ल के एक_एक शेर गागर में सागर की तरह थे. मोहब्बत,ज़िन्दगी, तन्हाई इंसानी रिश्तों में जज्बातों पर आधारीत उनकी शेर _शायरी सीधे रूह को छू लेती थी" भंडारा के रसिक श्रोता मोहम्मद सईद शेख ने ऐसा प्रतिपादन करते हुए बताया की "भंडारा शहर से भी बशीर बद्र साहब का नाता रहा है, जब भी भंडारा में मुस्लिम लाइब्रेरी के अखिल भारतीय मुशायरा व कवि सम्मेलन में आते भंडारा के हजारों रसिक श्रोताओ को अपनी बुलंद आवाज में अपने शेरों की बारिश से वाह _वाही करने पर मजबूर कर देते थे".उन्हें 1999 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया था. डीमेंशिया (कमज़ोर याददाश्त) के चलते लंबी जद्दोजहद के बाद 91 वर्ष की आयु में 28 मई 2026 को उन्होंने आखिरी साँस ली और दुनिया से अलविदा कह गए. शायरी की बुलंद आवाज़ खामोश हो गईं,वे अवाम के शायर थे,उनके शेर आज भी लोगों के दिलों व राजनीती के मंचों पर जिंदा हैl
उनके ख़ास शेरों में _
"उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो"
न जाने किस गली में जिंदगी कि शाम हो जाए"
"लोग टूट जाते है एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में"l


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