[श्रावस्ती,जहां तथागत ने 25 वर्षावास किए थे।]
सब्ब अत्थि इति सावत्थी = श्रावस्ती।
यहां पर सभी सुख- सुविधाएं उपलब्ध थी।
कि भन्ड अत्थि? अर्थात क्या-क्या उपलब्ध है?
सब्ब अत्थि- यहां सब उपलब्ध है।
सहेट ( Sahet ) &
महेट ( Mahet ):.
सहेट में बौद्ध पुरातत्वीय अवशेष, जेतवन विहार आदि खंडहर के रूप में मिले है।
महेट श्रावस्ती महानगर के जहां कच्ची कुटी और पक्की कुटी के पुरातत्वीय अवशेषों के साथ अन्य अवशेष मिले है ।
सहेट और महेट दोनों के बीच 500 मीटर की दूरी है। कुछ फर्लांग दूरी पर बहती अचिरावती ( राप्ती ) नदी।
इसा पूर्व छठी शताब्दि ( sixth century B.C. )
बौद्ध के आठ प्रमुख तीर्थ स्थलों ( श्रावस्ती, लुम्बिनी, बोधगया, सारनाथ, राजगीर, वैशाली, संकिसा, कुशीनगर) में श्रावस्ती मह्त्वपूर्ण तीर्थ है।
बुद्ध के समकालीन राजा पसेनदी (प्रसेनजित) कोसल नरेश की राजधानी श्रावस्ती थी।
पसेनदी राजा भगवान बुद्ध का परम उपासक था। पसेनदी के एक जेत नाम के राजकुमार से सुदत्त श्रेष्ठि (अनाथपिण्डिक) ने बगीचे की जमीन सोना मुहर बिछाकर खरीद की जिस पर जेतवन महाविहार का निर्माण हुआ। यहां तथागत ने 25 वर्षावास किए थे। जहां तथागत निवास करते थे वह मूलगंघ कुटी के अवशेष आज भी मौजूद है।
बुद्ध कालीन सब से बडा और समृद्ध महानगर श्रावस्ती था।
श्रावस्ती बलरामपुर-बहराइच रोड पर बलरामपुर से 10 कीमी की दूरी पर स्थित है। बलरामपुर और श्रावस्ती बीच रोड पर ओढाझाड नामक स्तूप है और उस के पास के गांव में पुब्बाराम के अवशेष अवस्थित है। पुब्बाराम का निर्माण मिगार माता के द्वारा हुआ था।
तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में अशोक के राजकाल में पूरा देश अपनी समृद्धि की चरम सीमा पर पहुंच गया था। कई वृतांत के अनुसार,अशोक ने जेतवन और श्रावस्ती का दौरा किया था। जब उन्होंने बुद्ध धम्म के पवित्र तीर्थों की देशव्यापी तीर्थयात्रा की, जिनमें से प्रत्येक पर उन्होंने क्षेत्र के प्रति अपनी श्रद्धा और विश्वास को दर्शाने के लिए ऐतिहासिक स्मारक छोड़े थे। ह्वेन त्सांग का कहना है कि अशोक ने जेतवन के पूर्वी द्वार के बाईं और दाईं ओर दो स्तंभ बनाए, जिनमें से प्रत्येक 21 मीटर ऊंचे थे। एक पर धम्मचक्र और दूसरे पर बैल स्थापित किया था।
ह्वेन त्सांग का कहना है कि जेतवन विहार संकुल में एक कुआं था (आज मौजूद है) जिसके बारे में कहा जाता था कि बुद्ध ने उसी कुंए के पानी का उपयोग किया था और
आसपास जहां बुद्ध चंक्रमण करते थे और उपदेश देते थे, उसके नजदीक अशोक ने बुद्ध के अवशेषों को स्थापित करने के लिए एक स्तूप का निर्माण किया था। जेतवन में 12वी शताब्दी के अवषेश मिलते है जिस में मुख्यतः कन्नौज के गढवाल राजा मदनपाल और उनका पुत्र गोविन्दचंद्र का मुख्य है।
बौद्ध ग्रंथों में कहा गया है कि सम्राट ने सारिपुत्त, महामोग्लायन, महाकश्यप और आनंद के स्तूप की पूजा की थी।
अनाथपिण्डिक के द्वारा बनाए गए जेतवन विहार आज खंडहर के रूप में दिखाई देता है। जेतवन विहार में स्थित मूल गंध कुटी में तथागत ने 25 वर्षावास बिताए थे।
भगवान बुद्ध ने प्रथम चार निकायों 871 सुत्तो का उपदेश सिर्फ श्रावस्ती में दिए थे। उस में से 844 उपदेश जेतवन में, 23 पुब्बाराम में और अन्य चार श्रावस्ती के पास दिए थे। 871 सुत्तो के उपदेश भगवान ने श्रावस्ती में दिए उनमें से 6 सुत्त दीघनिकाय, 75 सुत्त मज्झिमनिकाय, 736 सुत्त सयुंक्त निकाय में समाए है। तदुपरांत 416 जातक के उपदेश श्रावस्ती में दिए थे।
जेतवन विहार में सारिपुत्त के साथ अन्य प्रमुख अर्हंतो के स्तूप के खंडहर है। जेतवन विहार में अंगुलिमाल की दीक्षा हुई थी।
जेतवन विहार में आज भी
'आनंद बोधिवृक्ष' विद्यमान है जिसके नीचे तथागत ने ध्यान करते हुए एक रात बिताई थी।
श्रावस्ती महानगर में अवस्थित दो बुद्ध कालीन अवशेष कच्ची कुटी और पक्की कुटी हमें अनाथपिण्डिक और भन्ते अंगुलिमाल की याद दिलाते है। जेतवन की पूर्व दिशा में अवस्थित पुब्बाराम अग्र उपासिका विशाखा मिगारमाता की दान पारमीता आदि का स्मरण कराता है।
परिनिर्वाण के पहले धम्म सेनापति सारिपुत्त ने भगवान से अंतिम भेट की और भगवान सारिपुत्त को जाते हुए देखते है ऐसा मनोचित्र का भास होता है। भिक्खुनी यशोधरा और भिक्खुणी महाप्रजापति गोतमी की भगवान से अंतिम भेंट मन को भावुक बनाती है।
भिक्खुणी पटाचारा, किसा गोतमी, भन्ते अंगुलिमाल और अनगिनत प्रमुख भिक्खु, भिक्खुनियां, उपासक व उपासिकाओं का स्मरण होता है।
भगवान ने हजारों-हजार धम्म देशना इसी धरती पर दी थी। आज भी हम महामंगल सुत्त को सुन कर अपना जीवन सुधारते है।
साथ में देवदत्त की जमीन में धंस जानेसे मृत्यु हो गई यह भी स्मरण होता है।
शिलालेखीय साक्ष्यों के अनुसार शहर का प्रशासन मंत्रियों की एक परिषद द्वारा किया जाता था और शहर में और उसके आसपास राजमार्गों के किनारे बड़े भंडारगृह बनाए गए थे।
नमो बुद्धाय🙏🏼🙏🏼🙏🏼
22.08.2023


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