[ रजोहरण....रजोहरण .... रजोहरण....]
- चूल्लपन्थक
राजगृह में दो भाई थे। एक का नाम था महापन्थक और उनका छोटा भाई था चूल्लपन्थक। महापन्थक और चूल्लपन्थक भिक्षुसंघ में प्रव्रजित होकर जीवकाराम में ५०० भिक्षुओं के साथ विहार करते थे। चूल्लपन्थक की स्मरण शक्ति दुर्बल थी। उसे कुछ याद नही होता था। महापन्थक भिक्षुसंघ में भोजन प्रबंधक था। चूल्लपन्थक को एक गाथा याद करने के लिए दी गई थी। लेकिन चार माह में भी वह निम्नलिखित गाथा को याद नही कर पाया।
"पदुमं यथा कोकनदं सुगन्धं पातो सिया फुल्लमवीत गन्ध।
अंगीरसं पस्स विरोचमानं तपन्तमादिञ्चमिवन्त लिकखे।।"
- जिस प्रकार लाल कमल प्रकाशमान सूर्य को देख कर अत्यन्त सुगन्धमय तथा विकसित हो जाता है, उसी प्रकार तपते हुए आदित्य की तरह शोभायमान अंगरिस गोत्रिय भगवान बुद्ध को देखो।
एक भी गाथा याद नही कर सकने के कारण महापन्थक ने चूल्लपन्थक को संघ से निकाल दिया। चूल्लपन्थक को ग्लानि हुई। वह भिक्षापात्र उठाकर गृहस्थ होने के लिए चल पडा। यह बात तथागत के ध्यान में आई। उन्होंने चूल्लपन्थक को रोका - चूल्लपन्थक! कहां जा रहे हो?
चूल्लपन्थक ने सारी बात कह सूनाई।
तथागत ने कहा :- चूल्लपन्थक! लो, यह सफेद कपडे का टुकडा, इससे पूर्वाभिमुख हो मुंह पोंछते रहो और 'रजोहरणं.. रजोहरणं... रजोहरणं' बोलते रहो।
चूल्लपन्थक 'रजोहरणं.. रजोहरणं... रजोहरणं' बोलते बोलते मुंह पोंछता रहा। उसका सफेद वस्त्र गन्दा हो गया। उसने सोचा, यह शरीर का मल है, इसे अब दूर करना चाहिए। उसने अत्यधिक उत्साह और रूचि के साथ अपनी समाधि बढाई। देखते देखते वह अर्हंत हो गया।
जिस दिन चूल्लपन्थक अर्हंत हो गया उस दिन विहार के भिक्षुओं को जीवक ने भोजन पर आमंत्रित किया था। तथागत भिक्षुसंघ के साथ जहां भोजनदान था वहां गए। जब संघ भोजन के लिए बैठने वाला था तब बुद्ध ने कहा , ठहरो जीवक! अभी विहार में ओर भी भिक्षु है।
इस पर महापन्थक बोला- भन्ते! सभी भिक्षु आ गए है, वहां कोई नही है।
भगवान ने कहा :- 'नही वहां है।' एक आदमी को विहार में भेजा गया। जीवक का आदमी जब विहार में गया तब तक चूल्लपन्थक ने सभी सिद्धियां ठीक से प्राप्त कर ली थी। उसने जान लिया कि जीवक के घर किस प्रकार की बात चल रही है जीवक का आदमी जब वहां पहुंचा, तब उसने देखा कि पूरे विहार में भिक्खु भरे पडे है और सभी रजोहरणं... रजोहरणं... बोल रहे है।
उसने वापस आकर निवेदन किया कि महाराज, अभी तो विहार में हजारो भिक्षु है।
ऐसा सुन कर सभी विस्मय में पड गए।
भगवान बुद्ध ने कहा :- 'जाओ, जो चूल्लपन्थक है, उसे ले आओ। उसकी पहचान के लिए उन्होंने बताया कि तुम्हारे पूछने पर जो पहले कहे कि मैं चूल्लपन्थक हूं, उसी का हाथ पकडना।
वह आदमी फिर विहार में गया और उसने वैसा ही किया, जैसा कहा गया था। अब चूल्लपन्थक जीवक के भवन में भोजन के लिए आया और संघ में सम्मिलित हो गया।
इस प्रकार भगवान बुद्ध की शरण में आए प्रत्येक उपेक्षित, तिरस्कृत और निराश व्यक्ति अपनी साधना से अर्हंत हो गए।
नमो बुद्धाय🙏🏼🙏🏼🙏🏼
07.08.2023


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