[ लुम्बिनी बौद्धोंका महातीर्थ ]
" इध बुधे जाते"
बुद्ध धम्म के महान संरक्षक और बुद्धानुयायीओं में सम्राट अशोक
नाम प्रथम श्रेणी में आता है। बुद्ध धम्म को चिरायु रखने के लिए सम्राट अशोक ने जो धर्मापदेश शीलाओं पर अभिलेख खुदवाये थे वे आज भी विद्यमान है। वही शीला स्तंभ अभिलेखों से प्रमाणित हो चूका है कि तथागत गौतम बुद्ध ऐतिहासिक है और उनका जन्म रूपेनदेही ( वर्तमान लुम्बिनी ) में हुआ था ।
लुम्बिनी:
नेपाल में इसी पवित्र स्थान को आज रुम्मनदेई के नाम से जाना जाता है।
एक बार सम्राट अशोक के मन में भगवान बुद्ध के जन्म स्थान को देखने की प्रबल इच्छा हुई। तब सम्राट अपने गुरू मोग्गलिपुत्त तिस्य के साथ इस स्थान को देखने गए। सम्राट अशोक ने भगवान बुद्ध ( सिद्धार्थ ) के जन्म से 318 वर्ष बाद तथा अपने राज्याभिषेक के 20वें साल में यहां पर एक पाषाण स्तम्भ गाड दिया था। जिस पर " इध बुधे जाते" अर्थात यहां बुद्ध का जन्म हुआ अंकित किया। जो आज भी लुम्बिनी में खडा है और बुद्ध के जन्म स्थान को सुनिश्चित कर रहा है। जिस पुष्करणी (जल कुंड) में महामाया देवी ने स्नान किया था, वह आज भी विद्यमान है।
शाक्यों ने बुद्ध के प्रति अपनी असीम श्रद्धा के कारण तथागत की अस्थियों पर एक विशाल चैत्य का निर्माण किया था। वह चैत्य भी वर्तमान में खण्डहर के रूप में अशोक पिलर से लगभग 25 मीटर की दूरी पर विद्यमान है।
बौद्ध परंपरा के अनुसार रानी महामायादेवी ने 563 ईसा पूर्व सिद्धार्थ गौतम को जन्म दिया था। बाद में ज्ञान की प्राप्ति के बाद उन्हें बौद्ध कहा जाने लगा। चूंकि लुम्बिनी का संबंध बुद्ध के जन्मस्थान के तौर पर है लिहाजा इसका महत्व बहुत ज्यादा है। यह प्रमुख बौद्ध तीर्थस्थल में से एक तीर्थ स्थान है।
लुम्बिनी में मायादेवी मंदिर।
लुम्बिनी में कई पुराने मंदिर हैं, जिसमें महामाया देवी एक मंदिर है। साथ ही कई देशों और बौद्ध संगठनों द्वारा बनवाए गए नए बौद्ध विहार, स्तूप, स्मारक और मठ भी यहां हैं। कुछ का निर्माण का काम भी चल रहा है । यहां एक इंटरनेशनल रिसर्च सेंटर और म्युजियम भी है।
हिमालय की गोद में बसे देश नेपाल के दक्षिण क्षेत्र में शोधकर्ताओं की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने लुम्बिनी की खुदाई के दौरान सदियों पुराने एक विहार और गाँव का पता लगाया है। इस जगह के बारे में पहले से कोई जानकारी उपलब्ध नहीं थी। अब युनेस्को ने बुद्ध के जन्मस्थान को ऐतिहासिक महत्व की वैश्विक धरोहर घोषित कर रखा है। बुद्ध के समय में लुम्बिनी कपिलवस्तु के पूर्व में थी। लुम्बिनी, वो जगह है, जो अब दुनियाभर में बुद्ध धम्म और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी रहती हैं।
लुम्बिनी का वर्णन चीनी यात्री फाहियान और युवानच्वांग ने भी किया है। फाहियान के अनुसार कपिलवस्तु से 50 मील पूर्व में लुम्बिनी था। युवानच्वांग ने इस स्थान पर उस स्तूप को देखा था, जिसे अशोक ने बनवाया था। डॉ. फूहरर ने 1866 ई. में इस स्थान को खोज निकाला। तब से इस स्थान को बौद्ध जगत में पूजनीय स्थल के रूप में मान्यता मिली।
बौद्ध महातीर्थ लुम्बिनी का विकास उस तरह नहीं हुआ है, जैसा होना चाहिए। लेकिन, यहां पुरातत्व महत्व के साथ तमाम विहार, मठ और स्तूप देखने को मिलते हैं।
नमो बुद्धाय🙏🏼🙏🏼🙏🏼
21.08.2023


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