[खेमी अवेरी अभयो,
पण्डितो'ति पवुच्चति।।]
"न तेन पण्डितो होति,
यावता बहु भासति।
खेमी अवेरी अभयो,
पण्डितो'ति पवुच्चति।।"
- धम्मपद
अर्थात- बहुत बोलने से कोई पण्डित नहीं होता, प्रत्युत जो क्षमाशील, अवेरी और निर्भय होता है, वही पण्डित कहा जाता है।
एक बार भगवान जेतवन में,विहार कर रहे थे, वहां पर छ: वर्गीय भिक्खु भी थे। वे बड़ी गडबडी करते थे। वे गांव हो या विहार अपने आचरण से सब को दु:खी करते थे। जब किसी गांव में भोजनदान होता ,तो वे सामणेरों को बोलते थे, " देखो हम विद्वान हैं। हमको ठीक से उत्तर दो, हमारे साथ ठीक से बर्ताव करें। इस तरह से अपनी विद्वता झाड़ते रहते थे।
एक बार गांव में भोजनदान हुआ, वहां वे भिक्खु भी गए और कुछ सामणेर भी। वहां पर उन भिक्खुओं ने उन सामनेरों पर भोजन- बर्तन फेंक दिए और अपनी विद्वता झाड़ने लगे- देखो हम ही विद्वान है।
सामणेर वापस विहार मे आए। तब भिक्खुओं ने पूछा आवुसो ! आज भोजन कैसा रहा?
भन्ते ! मत पूछिए। इन छ: वर्गीय भिक्खुओं ने हमारे पर जूठन डाल दिया और हमसे बोलते रहे कि हम लोग ही शान्त और विद्वान है। इन्होने इस तरह से वहां बहुत,गडबडी हुई।
भिक्खु भगवान के पास गए और भगवान को सारी हकीकत बताई। यह सुनकर भगवान ने कहा- कोई ज्यादा भाषण करने से विद्वान नहीं हो जाता है। कोई ज्यादा बोलकर दूसरों को अपशब्द बोलकर, तंग करके गडबडी करके पण्डित नहीं हो जाता है।
जो धृणा से मुक्त है, क्षमावान है, निर्भय है वही पण्डित है।
नमो बुद्धाय🙏🏼🙏🏼🙏🏼
05.08.2023


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