[भवचक्र का कारण तृष्णा है।
तृष्णा का समुच्छेद प्रहाण जन्म मरण का सिलसिला बंद करता है ]
निरंजना नदी के समीप उरुवेला (बोधगया) में पीपल के वृक्ष की छाया में सिद्धार्थ गोतम को सम्यक सम्बोधि प्राप्त हुई। उस पवित्र स्थान 'वज्रासन' के निकट सुबह 5.30 समय ध्यान करने का लाभ मिला। धम्म के तरंगो से लबालब शांत और निर्मल वातावरण में सुबह ध्यान करने कितना लाभदायी है! बहुत लाभ हुआ, धम्म तरंगो से भर गए।
विपश्यना ध्यान करते- करते मानसिक- दर्शन(visualization) हुआ- भगवान बुद्ध इसी जगह ध्यानस्थ बैठे है और भगवान के उदान मनोद्वार पर सामने आया -
"अनेकजातिसंसारं,
सन्धाविस्सं अनिब्बिसं ।
गहकारकं गवेसन्तो,
दुक्खा जाति पुनप्पुनं ।।"
अर्थात :
बिना रूके अनेक जन्मों तक इस संसार में दौड़ता रहा । (इस काया रूपी) गृह को बनाने वाले को खोजते पुन: पुन: दु:ख- जन्म में पडता रहा ।
गहकारक ! दिट्ठोसि ,
पुन गेहं न काहसि ।
सब्बा ते फासुका भग्गा,
गहकूटं विसंङ्खितं ।
विसङ्खार गतं चित्तं,
तण्हानं खयमज्झगा ।
अर्थात :
हे गृहकारक ! ( घर बनानेवाले) ,
मैंने तुझे देख लिया,
(अब) फिर तू घर नहीं बना सकेगा ।
तेरी सभी कडियां भग्न हो गयीं,
गृह का शिखर गिर गया ।
चित्त संस्कार रहित हो गया ।
तृष्णाओं का क्षय हो गया हैं।
वैशाख पूर्णिमा की रात, उरुवेला में निरंजना नदी के तीर पिपल के वृक्ष के नीचे बोधिसत्व सिद्धार्थ ने 35 वर्ष की उम्र में सम्यक सम्बोधि प्राप्त की। उस समय बुद्ध के मुख से जो उदान (हर्षोल्लास) निकले वह भवचक्र के रहस्यों को उजागर करते हैं।
बुद्ध ने देखा की संसार में जन्म मरण का सिलसिला जारी रहता है। यह सिलसिला का कारण तृष्णा है। तृष्णा का समुच्छेद करने से यह सिलसिला बंद हो जाता है यानि आवागमन रुक जाता है। जन्म मरण का सिलसिला दुःखदायक है। यह दुःखदायक सिलसिला कौन चलाता है, या क्या कारण है, यह खोज ने के लिए बुद्ध अनेक जन्मों तक मां के गर्भ में पड़ते रहे और मृत्यु की ओर दौड़ लगाते रहे। आखिर में देखा कि "घर" बनाने वाला कोई नहीं है, "घर" अपनी तृष्णा के कारण ही स्वत: बनता है। जब बुद्ध ने "अनेक जातिसंसारं" का कारण जान लिया तब उन्होंने वही कारणों का क्षय कर दिया। अब "सन्धाविस्सं अनिब्बिसं" रूक गया और "दुक्खा जाति पुनप्पुनं " - दुखदायक जन्म मरण का सिलसिला सर्वथा निरूद्ध हो गया। तब उनके द्वारा उदान निकल पड़ा- "गहकारक ! दिट्ठोसि - "घर" बनाने वाले को देख लिया। कौन है "घर" बनाने वाला? ओह! यह तृष्णा ही "घर" बनाती है, अन्य कोई नहीं है।
इस उदान में ५ सत्य प्रकट होते हैं।
१. जन्म मरण का सिलसिला चलता है। वही संसार है।
२. जन्म मरण का सिलसिला चलता है अपनी तृष्णा के कारण।
३. तृष्णा चित्त में ठहरती है।
४. कोई अन्य ( ईश्वर या परमात्मा) के कारण जन्म मरण का सिलसिला नहीं चलता है।
५. अगर तृष्णा का समुच्छेद कर दिया तो जन्म मरण का सिलसिला रूक जाता है, आवागमन बंद हो जाता है।
नमो बुद्धाय🙏🙏🙏
बोधगया ( बिहार)
( रमेश बौद्ध बैंकर)
13.09.2024


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