🌳 [बोधिवृक्ष] 🌳
बोध गया, विहार
[ ऐतिहासिक साक्ष्य को जानें ]
"यस्स मूले नि'सिन्नोव सब्बारि विजयं अका।
पत्तो सब्बञ्ञुतं सत्था वन्दे तं बोधिपादपं।।
इमे हेते महाबोधि लोकनाथेन पूजिता।
अहम्पि ते नमस्सामि बोधिराजा नमत्थु ते।।"
भगवान बुद्ध ने जिस वृक्ष के नीचे बैठे हुए ही सब शत्रुओं पर विजय पाई तथा सर्वज्ञता का ज्ञान प्राप्त किया, उस बोधिवृक्ष को नमस्कार है।👏
यह बोधिवृक्ष लोकनाथ भगवान बुद्ध के द्वारा पूजित है, मैं भी उन्हें नमस्कार करता हूं- हे बोधिराजा! तुम्हें मेरा नमस्कार है।
बोधगया कि धरती को धम्म तरंगों से पल्लवित करता बोधिवृक्ष आज भी मौजूद है।
तथागत बुद्ध ने उसी जगह, जिसे आज वज्रासन कहते हैं वहां सम्यक सम्बोधि प्राप्त की थी। संबोधि प्राप्त करने के बाद एक सप्ताह तक वे सम्बोधि सुख का अनुभव करते रहे।
दुसरे सप्ताह अनिमेष लोचन स्थान पर खड़े खड़े अपलक दृष्टि से बोधिवृक्ष को वे देखते रहे। इस बोधिवृक्ष की हम वंदना करते हैं।
भगवान बुद्ध ने जिस वृक्ष के नीचे बैठकर सम्यक सम्बोधि प्राप्त की वह पिपल वृक्ष है। भगवान को ज्ञान की प्राप्ति इस पिपल वृक्ष के नीचे होने के कारण हम उसे बोधिवृक्ष कहते है।
बोधगया में महाबोधि महाविहार के पीछे खड़ा बोधिवृक्ष मूल बोधिवृक्ष की चौथी पीढ़ी का वृक्ष है।
मूल बोधिवृक्ष की पूजा वंदना करने के बाद महान सम्राट अशोक ने महाविहार का निर्माण करवाया था। वर्तमान महाविहार उस की नींव पर खडा है।
सम्राट अशोक की एक रानी तिष्यरक्खिता ने मूल बोधिवृक्ष को कटवा दिया था। लेकिन जड़ें जीवित होने के कारण पर बोधिवृक्ष पनप कर बड़ा हो गया और करीब ८०० साल तक सलामत रहा।
यह दुसरी पीढ़ी के बोधिवृक्ष को बंगाल के शशांक राजा ने बौद्ध धम्म के प्रति द्वेष और ब्राह्मण धर्म के प्रति अनुराग होने के कारण जला दिया था। जले हुए बोधिवृक्ष की जड़ों में से
फिर एक बोधिवृक्ष उठ खड़ा हुआ, जो तीसरी पीढ़ी का माना गया है।
तीसरी पीढ़ी का बोधिवृक्ष करीब 1250 साल तक जीवित रहा और फिर इ. स. 1876 में कुदरती होनारत में धराशाई हो गया। बाद में Lord Alexander Cunningham ने इ. स. 1881 में अनुराधापुर श्रीलंका से मूल बोधिवृक्ष से उत्पन्न बोधिवृक्ष लाकर बोधगया महाबोधि महाविहार में मूल स्थान पर लगाया। यह चौथी पीढ़ी का बोधिवृक्ष हुआ। यह मूल बोधिवृक्ष से उत्पन्न है, इसलिए यह बोधिवृक्ष मूल बोधिवृक्ष से भिन्न नहीं है।
महान सम्राट अशोक की राजकुमारी पुत्री संघमित्रा, जो भिक्खुणी थी, वह बोधगया से मूल बोधिवृक्ष की शाखा लेकर अनुराधापुर श्रीलंका गई थी और अनुराधापुर में बोधिवृक्ष लगाया गया था। वही बोधिवृक्ष आज भी मौजूद है, जीवंत है और उसका ऐतिहासिक records सुरक्षित है।
इ.स. 2007 में बोधगया स्थित बोधि वृक्ष का DNA test हुआ था और यह प्रमाणित हुआ कि बोधगया में स्थित बोधिवृक्ष अनुराधापुर श्रीलंका के बोधिवृक्ष का ही अंश है।
पवित्र बोधिवृक्ष से उत्पन्न अन्य बोधिवृक्ष महत्वपूर्ण बौद्ध स्थलों पर आज हम देखते हैं।
बोधिवृक्ष के दर्शन मात्र से बौद्ध धम्म अनुयाईओं को धम्मसंवेग जागते हैं और श्रद्धापूर्वक उसकी वंदना करते हैं।
अहम्पि ते नमस्सामि बोधिराजा नमत्थु ते।
नमो बुद्धाय🙏🙏🙏
17.09.2024
*गया से पटना की ओर सफर में


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