[मिथ्या दृष्टि -झूठी धारणा]
मिथ्या दृष्टि दुःख का कारण है।
"सचे भायसि दुक्खस्स,
सचे ते दुक्खमप्पियं ।
उपेहि सरणं बुद्धं,
धम्मं सङ्घञ्च तादिनं ।।"
-- दासी पूर्णा
नदी में स्नान करने से पाप कभी धुलते नहीं, शरीर का मैल दूर हो सकता हैं, लेकिन मन का मैल वैसे ही वैसे रहता हैं । शील का आचरण ही मन का मैल दूर करता हैं। यदि सचमुच तुझे दु:ख से भय हैं ,यदि सचमुच तुझे दु:ख अप्रिय लगता हैं तो तू बुद्ध, धम्म और संघ सदृश रत्नों की शरण ग्रहण कर ।"
श्रावस्ती में सुदत्त सेठ (अनाथपिण्डिक) की दासी की पुत्री थी पूर्णा । वह घर में पानी भरने का काम करती थी । अपने मालिक सुदत्त के माध्यम से वह भगवान बुद्ध के संपर्क में आयी और उनके उपदेशों से धम्म संविग्न हो, स्त्रोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित हो गई ।
एक समय मिथ्या धारणा रखनेवाले ब्राह्मण को देखकर उसे फटकारते हुए कहा कि
नदी में स्नान करने से पाप कर्म धुल जाते हैं, भव मुक्त हो जा सकते हैं, ऐसी मिथ्या धारणा रखने से कोई फायदा नहीं हैं ।
नदी के पानी में सुबह, दोपहर और शाम स्नान करने से पाप कभी धुलते नहीं हैं , ऐसा होता तो सदा पानी में रहने वाले मछलीयां भवचक्र से मुक्त हो जाती । मछली का पूरा जीवन पानी में ही होता हैं, क्या वह जीवन मुक्ति या भवचक्र मुक्ति पायेगी ?
ब्राह्मण को समझाते हुए पूर्णा ने कहा -
" समादियाहि सीलानि,
तं ते अत्थाय हेहिति ।"
"तू शील, सदाचार का पालन कर, इसी से तेरी अर्थसिद्धि होगी ।"
शील-व्रत-परामर्श अर्थात धार्मिक क्रिया - कलाप- व्रत-उपवास, पूजा-पाठ, यज्ञ-याग और कठिन तप आदि को मोक्ष के उपाय मानना और सत्काय दृष्टि होना मिथ्या धारणा हैं।
मिथ्या धारणा दुःख का कारण हैं।
मिथ्या घारणा से विरत होना मनुष्य के लिए सुखकर है।
नमो बुद्धाय🙏🏻🙏🏻🙏🏻


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