[ नीवरण- hindrance]
नीवरण यानी विघ्न
' ज्ञानादिकं निवारेन्तीति नीवरणानि-ध्यानादि कुशलधर्मो का निवारण ( लोप) करनेवाले धर्म 'निवरण' कहे जाते है 'कोसल ' ( कुशल ) का अर्थ 'शुभ ' है, 'पुण्य ' है। 'अकुसल ' (अकुशल)' का अर्थ 'अशुभ' है, 'पाप' है।
जब काम या द्वेष का चित्त उत्पन्न होता है, तब किसी कुशल चित्त के उत्पाद को अवकाश नहीं हो सकता।
नीवरणों के पांच प्रकार है :
1) कामछन्द:
विषयों में अनुराग, लोभ-मोह, काम-वासना, व्याकुल होना।
2) व्यापाद: हिंसा, द्वेष,घृणा करना।
3) स्त्यान-मिद्ध (थीनमिद्ध):
'स्त्यान' चित्त की अकर्मण्यता है एवं 'मिद्ध' आलस्य को कहते है। बेहोषी, आलस्य, तन्द्रा, निन्द्रा।
4) औद्धत्य-कौकृत्य ( उद्धच्च कुक्कुच्च ):
औद्धत्य का अर्थ है ' अव्यवस्थित चित्तता ' और कौकृत्य खेद ,पश्चाताप को कहते है। पश्चाताप,बैचेनी, व्याकुल, प्रक्षुब्ध होना।
5) विचिकित्सा ( विचिकिच्छा) :
संशय,संदेह,शंका को धारण करना। मुझ से नहीं होगा मेरा मन नहीं लगता, ऐसा चित्त में उत्पन्न होना, अपनी क्षमता पर संदेह होना। ये पांचों हमारे शत्रु है। इनसे। में बचना चाहिए,तो ही सम्यक समाधि प्राप्त हो सकती है, चित्त की सही एकाग्रता आ सकती है।
नमो बुद्धाय🙏🙏🙏
19.12.2023


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