[बुद्ध शासन में अर्थसम्पन्न हों,
निरोग हों,सुखी हों।]
तथागत ने कहा-
"भिक्षुओ, जो प्राणी पूर्वाह्न के समय शरीर से सदाचरण करते हैं, वाणी से सदाचरण करते हैं, मन से सदाचरण करते हैं, भिक्षुओ, उन प्राणियों का सुपूर्वाह्न है। भिक्षुओ, जो प्राणी मध्याह्न में शरीर से सदाचरण करते हैं, वाणी से सदाचरण करते हैं, मन से सदाचरण करते हैं,उन प्राणियों का वह सुमध्याह्न है। भिक्षुओ, जो प्राणी शाम के समय शरीर से सदाचरण करते हैं, वाणी से सदाचरण करते हैं, मन से सदाचरण करते हैं, उन प्राणियों का वह सुसायह्न है।"
सदाचरण क्या है?
सदाचरण है- शीलों का पालन करना।
प्राणी हत्या से विरत रहना, चोरी करने से विरत रहना, अनैतिक जीवन से विरत रहना, झूठ बोलने से विरत रहना, नशीले पदार्थो के सेवन से विरत रहना आदि अनेक शील है।
सदाचरण मन,वचन और शरीर से करना चाहिए। सदाचरण करने वाला सुखी होता है और ओरों के सुख के लिए सहायक होता है।
यही धम्म है, सुखी जीवन के लिए।
"सुनक्खत्तं सुमङ्गलं,
सुप्पभातं सुहुट्ठितं।
सुखणो सुमुहुत्तो च,
सुयिट्ठं ब्रह्मचारिसु।।
पदक्खिणं कायकम्मं,
वाचाकम्मं पदक्खिणं।
पदक्खिणं मनोकम्मं,
पणीधि ते पदक्खिणे।
पदक्खिणानि कत्वान,
लभन्तत्थे पदक्खिणे। ।
ते अत्थलद्धा सुखिता,
विरूळहा बुद्धसासने।
अरोगा सुखिता होथ,
सह सब्बेहि ञातिभी'ति।।"
- "वही सु-नक्षत्र है, सु-मंगल है, सु-प्रभात है, सु-उत्थान है, सु- क्षण है, सु- मुहूर्त है, ब्रह्मचारियों के साथ सु-यज्ञ है। शुभ कायकर्म ही प्रदक्षिणा है, वाणी का कर्म ही प्रदक्षिणा है, मानसिक कर्म प्रदक्षिणा है, प्रणिधान प्रदक्षिणा है। प्रदक्षिणा करने से यहां प्रदक्षिणा ( उन्नति ) की प्राप्ति है। उन अर्थों को प्राप्त करके सभी संबंधियों के साथ बुद्ध शासन में अर्थसम्पन्न हों, निरोग हों, सुखी हों। "
नमो बुद्धाय 🙏🙏🙏
Ref: अंगुत्तर निकाय: पूर्वाह्न सुत्त
24.05.2024


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