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विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) विशेष


विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) विशेष

भविष्य में आनेवाले  महासंकट से बचाव हेतु पर्यावरण संरक्षण सबका कर्तव्य,सबकी जिम्मेदारी

प्रकृति, देव, मानव ये सबसे सुंदर श्रृंखला है। भारतीय संस्कृति में पर्यावरण-संरक्षण का भाव अति प्राचीन और पुरातन है। हिमालय जैसे पहाड़, प्रचंड वेग से बहने वाली नदियां, समुद्र,उत्तर व दक्षिण ध्रुव, खनिज - संपत्ति ये सभी प्रकृति व सृष्टि की संपत्ति है, मानव की नहीं। आपने जंगल तोड़ना शुरू किया। वहीं से विनाश की शुरुआत हुई। करोड़ों वर्षों से यह पृथ्वी (वसुंधरा) तो मानव ने पिछले 400 वर्षों में अपनी ही संपत्ति मानकर उसका उपयोग किया। वायु प्रदूषण बढ़ा। युद्ध हुए,नए उत्पाद बढ़े। जमीन की जो आबादी कुछ लाखों में थी वो 6 अरब हो गई। प्रत्येक ने यदि 100 पेड़ लगाए तो ही पृथ्वी बचेगी। भारत में प्रतिवर्ष 1 करोड़ 70 लाख बच्चे जन्म लेते हैं, एक परिवार, एक अपत्य व 100 पेड़ यह हकीकत। पर्यावरण संरक्षण है आपका आज का कर्तव्य और जिम्मेदारी 

 दिन-ब-दिन पेड़ों की कटाई होने से धरती विरान होती जा रही है। इससे गर्मी लगातार बढ़ रही है। पहले 45 अंश सेल्सियस तापमान होता था।अब तो 47 से ऊपर नदी, जलाशय सूख गए। पानी का स्तर नीचे चला गया। पर अगले कुछ वर्षों में तापमान बढ़कर 50  और उससे भी ज्यादा बढ़ने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता. पानी के सभी स्रोत नामशेष होने की आशंका है और गांव के गांव के  उजड़ जाएंगे। मानव को गांव, शहर छोड़कर जलाशय, नदी व समुद्र के किनारे अपना निवास बनाना पड़ेगा। बदले हुए 
हवामान चक्र के कारण पर्यावरण असंतुलन के परिणाम मानव को भुगतने पड़ेंगे। ओजोन वायु पृथ्वी का सुरक्षा कवच है। प्रदूषण के कारण ओजोन को बहुत नुकसान पहुंच रहा है। ग्लेशियर पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है जो भविष्य का एक खतरनाक संकेत है। 
शहरीकरण के लिए हो रही वृक्ष कटाई, वाहनों के लिए भूमिगत ईंधन का अंधाधुंध उपयोग व उससे होने वाले ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन,सीमेंट कंक्रीट के लगातार फल_ फूल रहे जंगल,बोरवेलो की सैकड़ों फुट खुदाई,रेनवॉटर हार्वेस्टिंग की ओर लापरवाही आदि के कारण जल स्तर में नदी,तालाबों,झीलों में गिरावट,पशु व पक्षी व वन्य प्राणियों का अवैध शिकार ऐसी अनेक बातों से पृथ्वी के चारों ओर के वायुमंडल का संतुलन बिगड़ गया है। प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग इसका परिणाम है। 
संभवतः मानव के बिना पक्षी जीवित रह सकते हैं पर पक्षियों के बिना मानव का जीवन जीना असंभव है। मूक प्राणी व पक्षियों का शिकार सरेआम शुरू है। राष्ट्र की इस संपत्ति को भी बचाने केप्रयासभी अधूरे पड गये हैं। जल ही जीवन है। पानी का उचित उपयोग करना, एक-एक बूंद पानी बचाना ही सही उपाय है। जल संवर्धन यह आपका सामाजिक दायित्व व समय की मांग है। 

आगामी 50 वर्षों में पृथ्वी पर औसत तापमान 10 डिग्री फेरनहाइट से बढ़ेगा। इसके अलावा इस बढ़ते तापमान से ध्रुवीय प्रदेशों की बर्फ पिघलकर बड़े पैमाने पर समुद्र का जलस्तर बढ़कर असमय भयानक बाढ़, महापूर,भरती की भी संभावना बढ़ेगी। वनस्पति, अन्न-धान्य, जलचर, वन्य प्राणी इनका भी अस्तित्व लुप्त हो जाएगा।   सीमेंट के जंगलों, बसावट, वृक्ष तोड़ने से भूमि उजाड़ होती चली जा रही है। पहले मिट्टी, पूर,बर्फ पिघलने से नदियां और जमीन पर बर्फ समाप्त हो जाएगी तो नदियां भी समाप्त हो जाएंगी व बाद में संपूर्ण पृथ्वी का मरुस्थल के रूप में परिवर्तन हो जाएगा। यह आगे का भयानक चित्र है। मानव 22 वीं सदी देखेगा या नहीं, ऐसा प्रश्न है। 

ऐसे अनेक संभाव्य संकटों से जीव सृष्टि का अस्तित्व धीरे-धीरे समाप्त होने की संभावना नकार नहीं सकते। आज त्याग की आवश्यकता है। आज के लिए प्रतिबंधात्मक उपाय योजना आवश्यक है। विश्व के सभी देश ग्लोबल वार्मिंग की समस्या पर एकमत होकर समाधान निकालने के लिए प्रयत्नशील हैं। पर हम भी व्यक्तिगत रूप से इस युद्ध में अपना हाथ बंटा सकते हैं। वनराजी,वनो,जैवविविधता आदि की ज्यादा से ज्यादा तादाद बढ़ाकर,ईंधन बचाकर, पानी बचाकर, संरक्षण कर हम अपनी अगली पीढ़ियों को स्वस्थ और सुरक्षित पृथ्वी सौंपने के लिए यह सब करना अनिवार्य है। पर्यावरण दिवस 5 जून को मनाया जाता है। इस अवसर पर हम पर्यावरण संरक्षण का संकल्प करे,शपथ लें।

■ मो. सईद शेख
अध्यक्ष, ग्रीन हेरिटेज स्वयंसेवी संस्था, भंडारा।

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